CISF जवानों की बड़ी जीत:दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया पूरा HRA भुगतान करने का आदेश,110 से अधिक याचिकाएं मंजूर
दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के जवानों और उनके परिवारों को एक बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लगभग 110 संबद्ध रिट याचिकाओं को मंजूरी दे दी है, जिसमें जवानों को उस अवधि के लिए पूरा मकान किराया भत्ता (HRA) देने की मांग की गई थी, जिसके दौरान उन्हें ‘बैचलर’ मानकर केवल आधा (50%) भत्ता दिया जा रहा था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला मुख्य रूप से रिट याचिका (सिविल) संख्या 8154/2024 (आशीष शर्मा बनाम भारत संघ एवं अन्य) और उससे जुड़ी लगभग 110 अन्य याचिकाओं से संबंधित है। इन याचिकाओं में सीआईएसएफ के जवानों ने विभाग के उस नियम को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें फील्ड पोस्टिंग या अन्य कारणों से बैरकों या बैचलर सदस्य के रूप में दर्ज किया गया था। इस आधार पर विभाग उन्हें केवल 5% कम (आधा) एचआरए दे रहा था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि भले ही वे ड्यूटी के कारण बैचलर की तरह रह रहे थे, लेकिन उनके परिवार शहरों में महंगे किराए के मकानों में निवास कर रहे थे। ऐसे में आधा एचआरए मिलने से उन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा था।
कोर्ट का रुख और पुराना फैसला
माननीय उच्च न्यायालय ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पाया कि यह मामला पूरी तरह न्यायसंगत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में पूर्व में भी एक अंतिम निर्णय पारित किया जा चुका है, जिसे बाद में देश की सर्वोच्च अदालत (माननीय सर्वोच्च न्यायालय) ने भी अपनी मंजूरी दी थी।
उसी कानूनी सिद्धांत और पुराने फैसले को आधार मानते हुए, कोर्ट ने माना कि सभी याचिकाकर्ता प्रतिवादी (CISF) से शेष 5% एचआरए (यानी पूरा बकाया) प्राप्त करने के पूर्ण हकदार हैं।
समयबद्ध सीमा में भुगतान का निर्देश
माननीय उच्च न्यायालय ने सीआईएसएफ और भारत सरकार (प्रतिवादियों) को कड़े और समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि एक निश्चित समय सीमा के भीतर सभी याचिकाकर्ताओं की शेष एचआरए राशि की गणना की जाए और उसे तुरंत जारी किया जाए। इस फैसले से सैकड़ों पीड़ित जवानों को मानसिक और आर्थिक राहत मिलेगी।
अधिवक्ता पी. सुरेशन ने की पैरवी
सभी व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं की ओर से इन सभी 110 से अधिक याचिकाओं में प्रख्यात अधिवक्ता पी. सुरेशन ने पैरवी की। उन्होंने अदालत के सामने जवानों और उनके परिवारों की वित्तीय समस्याओं और कानूनी अधिकारों को मजबूती से रखा, जिसके परिणामस्वरूप यह ऐतिहासिक निर्णय आया।
इस फैसले के बाद अब अर्धसैनिक बलों के अन्य जवानों में भी उम्मीद की किरण जगी है, जो लंबे समय से इस तरह की प्रशासनिक विसंगतियों का सामना कर रहे थे।


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