मां के कैंसर इलाज के लिए ड्यूटी से अनुपस्थित SSB जवान को Gauhati High Court ने किया बहाल,लेकिन नहीं मिलेगा बकाया वेतन
Gauhati High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कैंसर से पीड़ित मां की देखभाल के लिए ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर सेवा से बर्खास्त किए गए Sashastra Seema Bal (SSB) के एक कांस्टेबल को पुनः सेवा में बहाल तो किया गया है, लेकिन उसे बर्खास्तगी की अवधि का बकाया वेतन नहीं मिलेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जवान की बहाली “सहानुभूति और नरमी” के आधार पर की गई थी, न कि इसलिए कि बर्खास्तगी का आदेश अवैध था।
न्यायमूर्ति Rajesh Mazumdar की एकल पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि 7 मई 2019 से 1 जनवरी 2024 तक की अवधि को ड्यूटी अवधि माना जाए और उसे वरिष्ठता, वेतन, वेतनवृद्धि व अन्य सभी सेवा लाभ दिए जाएं।
अदालत ने अपने 22 मई के आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को अवैध रूप से सेवा से बाहर नहीं रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि उसकी पुनर्बहाली केवल मानवीय आधार और सहानुभूति के कारण की गई थी, इसलिए “नो वर्क, नो पे” सिद्धांत लागू होगा।
मामले के अनुसार, SSB का जवान वर्ष 2017 में असम के चिरांग स्थित 15वीं बटालियन में तैनात था। उसने जनवरी 2019 में अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए 31 दिनों की छुट्टी ली थी। बाद में उसकी मां को कैंसर होने का पता चला, जिसके इलाज के लिए उसे मुंबई के Tata Memorial Hospital और वाराणसी के Homi Bhabha Cancer Hospital सहित कई अस्पतालों में ले जाना पड़ा। इसी कारण वह समय पर ड्यूटी पर वापस नहीं लौट सका।
लगातार अनुपस्थित रहने और ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं करने के आरोप में SSB अधिकारियों ने 17 जून 2019 को संक्षिप्त कोर्ट ट्रायल के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था। जवान ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन नवंबर 2019 में अपीलीय प्राधिकारी ने भी बर्खास्तगी को सही ठहराया।
इसके बाद जवान ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने नवंबर 2023 में मामले को दोबारा अपीलीय प्राधिकारी के पास भेजा, जिसके बाद जनवरी 2024 में जवान की बहाली का आदेश जारी किया गया। हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी से लेकर दोबारा जॉइन करने तक की अवधि को “नो वर्क, नो पे” के आधार पर नियमित किया जाएगा।
हाई कोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी के इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि जवान को उस अवधि का वेतन नहीं मिलेगा, क्योंकि उसने उस दौरान कार्य नहीं किया था। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा की निरंतरता बनी रहेगी और अन्य सेवा लाभों पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एस मित्रा ने दलील दी कि जब कोई कर्मचारी काम करने की इच्छा जताता है और उसे गलत तरीके से सेवा से बाहर रखा जाता है, तो पुनर्बहाली पर उसे पूरा वेतन मिलना चाहिए। वहीं सरकार की ओर से अधिवक्ता यू.के. गोस्वामी ने कहा कि जवान को कई नोटिस भेजे गए थे, लेकिन उसने समय पर जवाब नहीं दिया, इसलिए अधिकारियों की ओर से कोई गलती नहीं हुई।

