CRPF में HIV पॉजिटिव जवानों के प्रमोशन पर हाई कोर्ट सख्त, केंद्र को नियम बदलने के निर्देश। आदेश नहीं मानने पर होगी अवमानना की कार्रवाई
अहमदाबाद, 1 सितंबर 2026। गुजरात हाई कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में HIV पॉजिटिव कर्मियों के साथ भेदभाव से जुड़े सेवा नियमों में अब तक संशोधन नहीं किए जाने पर केंद्र सरकार और CRPF के वरिष्ठ अधिकारियों के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि उसके निर्देशों का निर्धारित समय में पालन नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
यह मामला एक महिला CRPF अधिकारी से जुड़ा है, जिन्हें HIV पॉजिटिव होने के कारण मेडिकल कैटेगरी में नीचे रखा गया था और इसके बाद उन्हें निर्धारित समय पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिल सका। मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने पहले 4 अगस्त 2025 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता CRPF में सब-इंस्पेक्टर (मिनिस्टेरियल) के पद पर कार्यरत थीं। HIV पॉजिटिव पाए जाने के बाद उन्हें लोअर मेडिकल कैटेगरी में रखा गया। इसके चलते उन्हें आगे इंस्पेक्टर (मिनिस्टेरियल) और फिर असिस्टेंट कमांडेंट (मिनिस्टेरियल) के पद पर निर्धारित समय पर प्रमोशन नहीं दिया गया।
महिला अधिकारी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
4 अगस्त 2025 को आया था मूल फैसला
गुजरात हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की पीठ ने 4 अगस्त 2025 को Isabella C.L. vs Union of India & Others मामले में फैसला सुनाया था।
अदालत ने कहा था कि केवल HIV पॉजिटिव होने के आधार पर किसी कर्मचारी को रोजगार या पदोन्नति के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसा भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत प्राप्त अधिकारों के खिलाफ है।
अदालत ने यह भी कहा था कि HIV/AIDS (Prevention & Control) Act, 2017 रोजगार में HIV पॉजिटिव व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
CRPF के नियमों पर भी उठाए थे सवाल
4 अगस्त 2025 के फैसले में हाई कोर्ट ने CRPF के Standing Order No. 04/2008 के Clause 4.13 और Assistant Commandant (Ministerial) Recruitment Rules, 2011 के Rule 5 को HIV/AIDS पॉजिटिव व्यक्तियों की नियुक्ति और पदोन्नति के संबंध में असंवैधानिक घोषित किया था।
अदालत ने इन प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 तथा HIV/AIDS (Prevention & Control) Act, 2017 के विपरीत माना था। साथ ही Standing Order के अन्य संबंधित प्रावधानों में भी ऐसे संशोधन करने को कहा था, जिनसे HIV पॉजिटिव कर्मियों के खिलाफ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भेदभाव की संभावना खत्म हो।
अब क्यों नाराज है हाई कोर्ट?
ताजा सुनवाई में अदालत के सामने सवाल यह था कि 2025 में स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद CRPF के सेवा नियमों में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं किए गए।
अदालत ने केंद्र सरकार और CRPF से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आदेशों का जानबूझकर पालन नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। ताजा कार्यवाही में अदालत ने HIV पॉजिटिव कर्मियों के प्रति मौजूद सामाजिक कलंक को खत्म करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
प्रमोशन की तारीख को लेकर भी विवाद
मामले में महिला अधिकारी को प्रमोशन देने की प्रभावी तारीख को लेकर भी विवाद सामने आया। CRPF ने उनके प्रमोशन का प्रभाव अगस्त 2019 से आगे की तारीख से लागू किया था, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को अगस्त 2019 में ही प्रमोशन मिल चुका था।
अदालत ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया और माना कि उसके मूल आदेश में ऐसी कोई अस्पष्टता नहीं थी जिसके आधार पर आदेश को अलग तरीके से लागू किया जाए।
HIV पॉजिटिव कर्मियों के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणी
2025 के अपने फैसले में गुजरात हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई कर्मचारी HIV पॉजिटिव है लेकिन सेवा के लिए अन्यथा योग्य है, तो केवल उसकी HIV स्थिति को पदोन्नति रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने कहा कि HIV स्टेटस के आधार पर प्रमोशन से इनकार करना भेदभावपूर्ण होगा और समानता, सरकारी रोजगार में समान अवसर तथा जीवन के अधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर सकता है।
अब आगे क्या?
फिलहाल मुख्य सवाल यह है कि केंद्र सरकार और CRPF 4 अगस्त 2025 के गुजरात हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अपने सेवा नियमों में कब तक संशोधन करते हैं।
यदि निर्धारित समयसीमा में अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों को अवमानना की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
महत्वपूर्ण: यह खबर 1 सितंबर 2026 की ताजा अनुपालन कार्यवाही पर आधारित है। HIV पॉजिटिव CRPF महिला अधिकारी के पक्ष में मूल फैसला 4 अगस्त 2025 को गुजरात हाई कोर्ट ने सुनाया था। ताजा कार्यवाही उसी आदेश के अनुपालन से संबंधित है।

