ITBP कॉन्स्टेबल को राहत: सीनियर अफसर की पत्नी से संबंध मामले में बर्खास्तगी की सजा बदली, हाईकोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दिया आदेश
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के एक कॉन्स्टेबल को बड़ी राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी की सजा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) में बदल दिया है। अदालत ने कहा कि मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए नौकरी से निकालने की सजा अत्यधिक कठोर और असंगत प्रतीत होती है।
मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि जब संबंधित वरिष्ठ अधिकारी को भी अनुशासनात्मक कार्रवाई में दोषी पाया गया और उसे अपेक्षाकृत हल्की सजा दी गई, तब जूनियर कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करना समानता और दंड की अनुपातिकता के सिद्धांतों के विपरीत है।
मामला उस समय का है जब अपीलकर्ता कॉन्स्टेबल लेह में तैनात था और असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के सुरक्षा सहायक के रूप में कार्यरत था। इसी दौरान उसके और अधिकारी की पत्नी के बीच आपसी सहमति से संबंध बने। शिकायत मिलने के बाद ITBP अधिनियम, 1992 के तहत विभागीय कार्रवाई शुरू की गई और समरी फोर्स कोर्ट ने उसे अनुशासन एवं व्यवस्था के विरुद्ध आचरण का दोषी मानते हुए जून 2010 में सेवा से बर्खास्त कर दिया था।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कॉन्स्टेबल ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल सजा की कठोरता पर सवाल उठाया। अदालत ने पाया कि संबंधित असिस्टेंट कमांडेंट के खिलाफ भी अलग विभागीय कार्रवाई हुई थी। उस पर अपनी पत्नी और कॉन्स्टेबल के बीच यौन संबंधों की रिकॉर्डिंग लैपटॉप में रखने का आरोप साबित हुआ था, जिसके लिए उसे केवल दो वर्ष की पिछली सेवा जब्त किए जाने की सजा दी गई थी।
खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वरिष्ठ अधिकारी को घटनाओं की जानकारी थी और उसने बाद में भी कॉन्स्टेबल को अपने साथ बनाए रखा। ऐसे में केवल जूनियर कर्मचारी को सबसे कठोर सजा देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
हालांकि अदालत ने इस आचरण को “बेहद घृणित” बताते हुए कहा कि सशस्त्र बलों में अनुशासन सर्वोपरि है, फिर भी न्याय के हित में बर्खास्तगी की सजा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदला जाना उचित होगा। अदालत ने संबंधित आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि कॉन्स्टेबल को सभी पात्र लाभों के साथ अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त माना जाए।
मामले का शीर्षक: Ashwani Kumar v. Union of India & Others

