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21 साल बाद BSF के पूर्व जवान को मिली न्यायिक राहत, हाई कोर्ट ने दिव्यांगता पेंशन का रास्ता किया साफ

चंडीगढ़। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक पूर्व जवान को 21 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बड़ी राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बीएसएफ की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी जवान को भर्ती के समय पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था और बाद में सेवा के दौरान बीमारी सामने आती है, तो उसे सेवा से जुड़ी बीमारी माना जाएगा। ऐसे मामलों में कर्मचारी को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह मामला हरियाणा के भिवानी निवासी अजमेर सिंह से जुड़ा है, जो वर्ष 1990 में बीएसएफ में भर्ती हुए थे। सेवा के दौरान वर्ष 1996 में उन्हें पहली बार मिर्गी (एपिलेप्सी) का दौरा पड़ा। बाद में मेडिकल बोर्ड ने उन्हें ‘ग्रैंडमल एपिलेप्सी’ से पीड़ित बताते हुए आगे की सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इसके आधार पर 30 नवंबर 2005 को उन्हें मेडिकल आधार पर सेवा से मुक्त कर दिया गया।

अजमेर सिंह का कहना था कि उन्हें गलत तरीके से सेवा से हटाया गया और वे दिव्यांगता पेंशन के हकदार हैं। साथ ही उनकी लगभग 50 हजार रुपये की ग्रेच्युटी राशि भी लंबित थी। उन्होंने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वर्ष 2008 में ट्रायल कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद उन्होंने जिला न्यायाधीश, भिवानी की अदालत में अपील दायर की। अपीलीय अदालत ने वर्ष 2010 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए उनके पक्ष में निर्णय दिया। इस फैसले को बीएसएफ अधिकारियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी।

हाई कोर्ट में बीएसएफ की ओर से तर्क दिया गया कि मिर्गी ऐसी बीमारी नहीं है जिसे सेवा के दौरान उत्पन्न हुई बीमारी माना जाए, इसलिए अजमेर सिंह दिव्यांगता पेंशन के पात्र नहीं हैं। वहीं, कर्मचारी की ओर से कहा गया कि भर्ती के समय वह पूरी तरह स्वस्थ थे और बीमारी सेवा के दौरान सामने आई थी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘धर्मवीर सिंह बनाम भारत संघ’ का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि कर्मचारी भर्ती के समय बीमारी से ग्रस्त था, तो यह माना जाएगा कि वह स्वस्थ था और बाद में स्वास्थ्य में आई गिरावट सेवा के दौरान हुई।

अदालत ने पाया कि अजमेर सिंह को पहला मिर्गी का दौरा भर्ती होने के छह वर्ष बाद पड़ा था। उन्हें किसी अनुशासनहीनता या कदाचार के कारण नहीं, बल्कि केवल मेडिकल आधार पर सेवा से हटाया गया था। ऐसे में बीमारी और सेवा के बीच संबंध को नकारा नहीं जा सकता।

हाई कोर्ट ने जिला न्यायाधीश के फैसले को सही ठहराते हुए बीएसएफ की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही 21 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे पूर्व जवान अजमेर सिंह के लिए दिव्यांगता पेंशन प्राप्त करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

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