BSF जवान के बेटे जतिन चाहर ने लहराया परचम, JEE-एडवांस में हासिल की ऑल इंडिया 3rd रैंक
देर रात जारी हुए देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा ‘JEE एडवांस’ के नतीजों में शेखावाटी के होनहार छात्र जतिन चाहर ने इतिहास रच दिया है। जतिन ने ऑल इंडिया लेवल पर तीसरी (3rd) रैंक हासिल कर न सिर्फ अपने परिवार का, बल्कि पूरे प्रदेश का नाम रोशन किया है। जतिन की इस स्वर्णिम सफलता से सीमा सुरक्षा बल (BSF) और देश सेवा में जुटे जवानों का सिर भी गर्व से ऊंचा हो गया है, क्योंकि उनके पिता दिनेश चाहर BSF में हेड कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात हैं।
माँ के साथ सीकर में रहकर की तैयारी
जतिन मूल रूप से झुंझुनूं जिले के गोठ गांव के रहने वाले हैं। जतिन की पढ़ाई और उनके भविष्य को संवारने के लिए उनकी माँ मोनिका उनके साथ सीकर में रहकर तैयारी करवा रही थीं। जतिन ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी माँ को देते हुए कहा, “माँ ने यहाँ रहकर न सिर्फ मेरी पढ़ाई और सुख-सुविधाओं का ध्यान रखा, बल्कि जब भी मैं थोड़ा परेशान होता, तो उन्होंने मुझे कभी डिमोटिवेट नहीं होने दिया।”
सफलता का सबसे बड़ा मंत्र: मोबाइल और सोशल मीडिया से बनाई दूरी
आज के दौर में जहाँ युवाओं का एक बड़ा वक्त स्मार्टफोन और रील देखने में गुजर जाता है, वहीं जतिन चाहर ने अपनी पढ़ाई को लेकर ऐसा फोकस दिखाया जो मिसाल बन गया है। जतिन ने बताया कि उनकी इस ऐतिहासिक सफलता में सबसे बड़ा योगदान ‘मोबाइल से दूरी’ रहा। उन्होंने आज तक कभी खुद का मोबाइल इस्तेमाल नहीं किया और न ही किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनका कोई अकाउंट है।
रोजाना 12 घंटे की पढ़ाई और ‘सेम डे डाउट क्लियर’ फॉर्मूला
जतिन ने अपनी स्ट्रेटजी शेयर करते हुए बताया कि वे कोचिंग के अलावा घर पर रोजाना 6 से 7 घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। इस तरह वे हर दिन करीब 12 घंटे पढ़ाई को देते थे। पढ़ाई के दौरान उनका एक ही नियम था—जो भी टॉपिक कठिन लगता, उसके डाउट्स को वे उसी दिन (Same Day) क्लियर करते थे। डाउट्स दूर होने के बाद ही वे अगले टॉपिक पर आगे बढ़ते थे।
ड्यूटी के कारण पिता नहीं दे पाए ज्यादा वक्त, पर बनाए रखा हौसला
जतिन के पिता दिनेश चाहर सीमा सुरक्षा बल (BSF) में हेड कॉन्स्टेबल हैं। देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी के चलते वे बेटे की पढ़ाई के लिए ज्यादा समय तो नहीं निकाल पाते थे, लेकिन देश सेवा के साथ-साथ वे बेटे का हौसला बढ़ाना कभी नहीं भूलते थे। पिता दिनेश ने बताया कि वे जब भी छुट्टी पर सीकर आते, तो जतिन के साथ बैठकर उसकी पढ़ाई और प्रोग्रेस को लेकर लगातार डिस्कशन करते थे। वहीं माँ मोनिका भी लगातार बेटे से पूछती रहती थीं कि पढ़ाई में कोई दिक्कत तो नहीं आ रही, ताकि उसे मानसिक रूप से मजबूत रख सकें।
जतिन की इस बेमिसाल कामयाबी ने यह साबित कर दिया है कि अगर दृढ़ संकल्प, कड़ा अनुशासन और लक्ष्य के प्रति ईमानदारी हो, तो सुख-सुविधाओं और आधुनिक गैजेट्स के बिना भी दुनिया का कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है।

