दिल्ली में 270 CAPF कंपनियां क्यों तैनात? हाईकोर्ट पहुंचा मामला, सरकार से मांगा पूरा रिकॉर्ड
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था संबंधी ड्यूटी के लिए बड़ी संख्या में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती और उसकी अवधि बार-बार बढ़ाए जाने का मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। पूर्व सिविल सेवक आशीष जोशी ने जनहित याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से CAPF की तैनाती के आदेश, सुरक्षा आकलन, बलों की वास्तविक संख्या और तैनाती बढ़ाने के कारण अदालत के सामने रखने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि दिल्ली में CAPF की बड़े पैमाने पर तैनाती के कानूनी और प्रशासनिक आधार की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक शुरुआत में 301 कंपनियों की मंजूरी की बात सामने आई थी। बाद में 273 कंपनियों की तैनाती 31 अक्टूबर 2026 तक जारी रखी गई और इसके बाद 270 कंपनियों की तैनाती 16 नवंबर 2026 तक बढ़ाई गई।
कितने जवान दिल्ली पहुंचे, इसका भी मांगा पूरा हिसाब
याचिकाकर्ता ने गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से बलवार और तारीखवार पूरा विवरण देने की मांग की है। इसमें यह बताने को कहा गया है कि कितनी कंपनियों की तैनाती स्वीकृत की गई, कितने जवानों को दिल्ली भेजा गया, कितनों ने वास्तव में रिपोर्ट किया और उनमें से कितने जवानों को विरोध-प्रदर्शन संबंधी ड्यूटी पर लगाया गया।
इसके साथ ही यह जानकारी भी मांगी गई है कि कितने जवानों को रिजर्व में रखा गया और किन परिस्थितियों में कंपनियों की संख्या घटाने या वापस बुलाने का निर्णय लिया गया।
6, 8, 22 और 29 अक्टूबर के फैसलों पर मांगा रिकॉर्ड
PIL में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से 6 अक्टूबर, 8 अक्टूबर, 22 अक्टूबर और 29 अक्टूबर 2026 को CAPF की तैनाती और उसकी अवधि बढ़ाए जाने से जुड़े आदेश, मंजूरी और अन्य रिकॉर्ड अदालत में रखने की मांग की गई है।
याचिका में यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि CAPF की मांग किस अधिकारी या एजेंसी ने की, गृह मंत्रालय ने उसे किस आधार पर मंजूरी दी और बाद में तैनाती को लगातार जारी रखने का फैसला किन सुरक्षा परिस्थितियों के आधार पर लिया गया।
‘इतनी बड़ी संख्या में फोर्स की जरूरत क्यों पड़ी?’
याचिका का एक प्रमुख हिस्सा सुरक्षा खतरे के आकलन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने सरकार से यह बताने की मांग की है कि उस समय किस तरह के खतरे की आशंका थी, जिसके आधार पर इतनी बड़ी संख्या में CAPF कंपनियों की तैनाती जरूरी मानी गई।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और हिंसा की वास्तविक आशंका के बीच अंतर करने के लिए कौन से मापदंड अपनाए गए तथा क्या बड़ी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती से पहले अन्य कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार किया गया था।
दूसरी सुरक्षा जिम्मेदारियों पर प्रभाव का भी मांगा आकलन
याचिका में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए यह भी पूछा गया है कि दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में CAPF जवानों की तैनाती का अन्य महत्वपूर्ण सुरक्षा जिम्मेदारियों पर क्या असर पड़ा।
इसमें आतंकवाद या उग्रवाद विरोधी अभियानों, सीमा सुरक्षा, चुनावी तैयारियों और आपदा प्रतिक्रिया जैसी जिम्मेदारियों पर पड़ने वाले संभावित परिचालन प्रभाव का आकलन भी रिकॉर्ड पर रखने की मांग की गई है।
16 नवंबर के बाद तैनाती जारी रखनी है तो कारण बताने की मांग
याचिकाकर्ता ने अदालत से यह निर्देश देने की मांग की है कि 16 नवंबर 2026 के बाद CAPF की तैनाती को आगे बढ़ाया जाए तो इसके लिए लिखित और कारणयुक्त आदेश जारी किया जाए।
ऐसे आदेश में यह स्पष्ट किया जाए कि आगे भी तैनाती की आवश्यकता क्यों है, कितनी कंपनियां तैनात रहेंगी, उनका भौगोलिक दायरा क्या होगा, किन वैकल्पिक उपायों पर विचार किया गया और तैनाती की अगली समीक्षा कब की जाएगी।
CAPF तैनाती का आदेश अपने आप बल प्रयोग की अनुमति नहीं: याचिका
PIL में यह घोषणा करने की भी मांग की गई है कि नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए CAPF की तैनाती का आदेश अपने आप किसी शांतिपूर्ण सभा को तितर-बितर करने, केवल प्रदर्शन में भाग लेने के कारण किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने या बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं देता।
याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी प्रकार की कठोर या बलपूर्वक कार्रवाई के लिए अलग से कानूनी आधार होना चाहिए और ऐसी कार्रवाई आवश्यकता, अनुपातिकता और जवाबदेही के संवैधानिक मानकों पर खरी उतरनी चाहिए।
BNSS की धाराओं 148 से 151 का दिया हवाला
याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराओं 148 से 151 का भी उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि भीड़ नियंत्रण या किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई के दौरान संबंधित कानूनी प्रावधानों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन आवश्यक है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं और तैनाती की आवश्यकता, अनुपातिकता, अवधि और समय-समय पर समीक्षा को लेकर स्पष्ट जवाबदेही की मांग की गई है।
आठ सप्ताह में लिखित प्रोटोकॉल बनाने की मांग
आशीष जोशी ने अदालत से केंद्र सरकार को अन्य संबंधित एजेंसियों से परामर्श कर आठ सप्ताह के भीतर एक लिखित प्रोटोकॉल तैयार और अधिसूचित करने का निर्देश देने की भी मांग की है।
यह प्रोटोकॉल ऐसे मामलों में लागू करने की मांग की गई है, जहां विरोध-प्रदर्शन संबंधी ड्यूटी के लिए बड़ी संख्या में CAPF जवानों की तैनाती की जाती है या उनकी तैनाती बार-बार बढ़ाई जाती है।
प्रोटोकॉल में जवानों की संख्या तय करने, खतरे का आकलन करने, नियमित समीक्षा करने और फैसलों का रिकॉर्ड रखने के स्पष्ट मानक तय करने की मांग की गई है।
अक्टूबर की तैनाती के सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
याचिका में अक्टूबर 2026 में CAPF की तैनाती से जुड़े सभी महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का भी अनुरोध किया गया है।
इन रिकॉर्ड में तैनाती और अवधि बढ़ाने के आदेश, पुलिस की मांग, बलों की संख्या से जुड़े विवरण, समीक्षा नोट, अधिकारियों के बीच समन्वय संबंधी निर्देश, खर्च का रिकॉर्ड और घटनाओं से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाना जरूरी है, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर तैनाती से जुड़े निर्णय और उनके क्रियान्वयन की प्रभावी समीक्षा की जा सके।
अब दिल्ली हाईकोर्ट के रुख पर नजर
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें CAPF की तैनाती पर रोक लगाने की सीधी मांग के बजाय बड़े पैमाने की तैनाती के पीछे पारदर्शिता, सुरक्षा आकलन, जवाबदेही और नियमित समीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
फिलहाल ये सभी मांगें याचिकाकर्ता की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखी गई हैं। अदालत ने इन मांगों पर अंतिम निर्णय अभी नहीं दिया है। इसलिए CAPF की तैनाती को गैरकानूनी या अनुचित मान लेना इस चरण में सही नहीं होगा।

