20 साल की अर्ह सेवा से पहले BSF से इस्तीफा देने पर पेंशन नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक पूर्व कांस्टेबल की पेंशन से जुड़ी याचिका खारिज करते हुए कहा है कि निर्धारित अर्ह सेवा पूरी किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले कर्मचारी को पेंशन का अधिकार नहीं मिलता।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने बलिया निवासी पूर्व BSF कांस्टेबल बचा लाल सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
पारिवारिक परिस्थितियों के कारण दिया था इस्तीफा
बचा लाल सिंह की नियुक्ति 22 अक्टूबर 1973 को BSF में कांस्टेबल के पद पर हुई थी। उन्होंने पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए 13 सितंबर 1984 को इस्तीफा देने का अनुरोध किया था।
याची के अनुसार, उनके भाई की मृत्यु हो गई थी और उनके वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए परिवार में कोई अन्य पुरुष सदस्य नहीं था। इन्हीं परिस्थितियों के कारण उन्होंने बल से इस्तीफा देने का निर्णय लिया।
बल के अधिकारियों ने 29 सितंबर 1984 को उनका साक्षात्कार लेकर उन्हें इस्तीफे के परिणामों के बारे में बताया था। इसके बावजूद उनके अनुरोध पर इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया और यह 1 अक्टूबर 1984 से प्रभावी हो गया।
दोबारा भर्ती की कोशिश भी हुई थी
इस्तीफा देने के बाद याची ने वर्ष 1985 में दोबारा BSF में भर्ती होने का प्रयास किया, लेकिन उनका अनुरोध 12 फरवरी 1985 को अस्वीकार कर दिया गया।
इसके करीब 15 वर्ष बाद उन्होंने अपनी पूर्व सेवा के आधार पर पेंशन की मांग की। हालांकि, उनकी पेंशन संबंधी मांग को 20 जून 2000 को खारिज कर दिया गया।
10 साल 11 महीने की सेवा का दिया हवाला
याची की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने 10 वर्ष 11 महीने 10 दिन की सेवा पूरी की है और CCS (Pension) Rules, 1972 के नियम 49 तथा सुप्रीम कोर्ट के बसीरभाई आर. खिलजी (2007) के फैसले के आधार पर वह पेंशन के हकदार हैं।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता अरविंद कुमार गोस्वामी ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि BSF जवानों के प्रशिक्षण में सरकार का काफी समय और धन खर्च होता है और इसलिए सेवा से स्वेच्छा से इस्तीफा देने की स्थिति में पेंशन संबंधी लाभ स्वतः नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने नियम 49 की व्याख्या स्पष्ट की
हाई कोर्ट ने कहा कि CCS (Pension) Rules, 1972 का नियम 49 पेंशन की गणना की प्रक्रिया से संबंधित है। यह अपने आप में न्यूनतम अर्हक सेवा निर्धारित करने वाला प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि याची ने न तो इस्तीफा स्वीकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी और न ही वर्ष 1985 में दोबारा भर्ती से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
इसके अलावा, पेंशन के दावे को लेकर करीब 15 वर्ष की देरी को भी कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। याची की ओर से इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
इन परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

