‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति कोई दंड नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की CISF इंस्पेक्टर की बहाली की अपील
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सेवा में पारदर्शिता और उच्च मानकों को बनाए रखने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति किसी कर्मचारी के लिए दंड नहीं है, बल्कि इसका मकसद व्यवस्था से निष्क्रिय और अनुपयोगी तत्वों को बाहर करना है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने CISF के एक इंस्पेक्टर की नौकरी में बहाली की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
क्या था मामला?
अपीलकर्ता ने 28 जून 1982 को CISF में सहायक उप-निरीक्षक के पद पर सेवा शुरू की थी। सेवा के दौरान उन्हें दो बार पदोन्नति भी मिली। लेकिन सेवा के अंतिम वर्षों में उनके प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई।
कोर्ट ने ACR यानी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट का विश्लेषण किया तो पाया कि अपीलकर्ता की ग्रेडिंग ‘अच्छी’ से घटकर ‘औसत’ पर आ गई थी और उसके बाद वहीं बनी रही। इसी आधार पर 2010 में विभाग ने उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को सही ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने कहा कि CISF एक अत्यंत अनुशासित बल है जिस पर देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। ऐसे बल के हर सदस्य से दक्षता, चौकसी और अनुशासन की अपेक्षा की जाती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दंडात्मक नहीं होता। इसका उद्देश्य किसी की छवि धूमिल करना या कलंक लगाना नहीं है। यह पूरी तरह जनहित में लिया गया प्रशासनिक निर्णय है, ताकि सरकार और विभाग की कार्यकुशलता बनी रहे।”
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए CISF इंस्पेक्टर की बहाली की अपील खारिज कर दी।

