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राजस्थान हाईकोर्ट:पति का नौकरी छोड़ने के लिए दबाव बनाना ‘क्रूरता’,BSF महिला जवान को मिला तलाक

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने वैवाहिक विवाद के एक महत्वपूर्ण मामले में सीमा सुरक्षा बल (BSF) में तैनात महिला जवान के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने पति द्वारा प्रताड़ना, दहेज मांग, नौकरी छोड़ने का दबाव और लंबे समय से अलग रहने को ‘क्रूरता’ एवं ‘परित्याग’ मानते हुए महिला को तलाक की डिक्री प्रदान कर दी।

कोर्ट ने चूरू जिले के सरदारशहर स्थित फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें महिला की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी।

शादी के बाद शुरू हुई प्रताड़ना

अपीलार्थी महिला जवान चूरू जिले के एक गांव की निवासी हैं और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में बीएसएफ में तैनात हैं। उनकी शादी वर्ष 2009 में चूरू जिले के ही एक अन्य गांव के युवक से हुई थी। दोनों की सात वर्षीय बेटी है, जो मां के साथ रह रही है।

महिला ने अपनी याचिका में बताया कि विवाह के बाद से ही पति और ससुराल पक्ष द्वारा 10 लाख रुपये नकद और पॉश इलाके में मकान की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट और मानसिक उत्पीड़न शुरू कर दिया गया। आरोप है कि पति उसकी पूरी सैलरी छीन लेता था और शराब में खर्च कर देता था।

पति का आपराधिक रिकॉर्ड और असुरक्षा का माहौल

कोर्ट के समक्ष यह भी तथ्य रखा गया कि पति आपराधिक प्रवृत्ति का है और भानीपुरा थाने में दर्ज एक मामले में वह पुलिस कस्टडी में भी रह चुका है। इस कारण महिला हमेशा भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन जीने को मजबूर थी।


नौकरी छोड़ने का दबाव और चरित्र पर आरोप

महिला को वर्ष 2013 में बीएसएफ में सरकारी नौकरी मिलने के बाद विवाद और बढ़ गया। पति ने उस पर नौकरी छोड़ने का लगातार दबाव बनाया। फैमिली कोर्ट में दिए गए जवाब में पति ने पत्नी के चरित्र पर गंभीर और आपत्तिजनक आरोप लगाते हुए उस पर अवैध संबंधों के आरोप भी लगाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कामकाजी महिला को करियर छोड़ने के लिए मजबूर करना तथा उसके चरित्र पर आधारहीन आरोप लगाना गंभीर मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस में शिकायत न करने का अर्थ यह नहीं है कि महिला ने प्रताड़ना नहीं झेली, क्योंकि सामाजिक बदनामी के डर से कई महिलाएं चुप रह जाती हैं।

10 साल से अलग रह रहे थे दंपती

खंडपीठ ने पाया कि पति-पत्नी मई 2015 से पिछले लगभग 10 वर्षों से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंधों के पुनर्स्थापन की कोई संभावना नहीं बची है। नोटिस जारी होने के बावजूद पति हाईकोर्ट में पेश नहीं हुआ, जिसे कोर्ट ने उसकी ‘मौन सहमति’ माना।


हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक मंजूर

राजस्थान हाईकोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 के तहत महिला जवान की अपील स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री जारी कर दी। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलने के बाद महिला को वैवाहिक संबंध से मुक्त करना न्यायोचित है।

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