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Criminal Trial के दौरान भी चल सकती है BSF Court of Inquiry: जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट का अहम फैसला

श्रीनगर: जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) के नियमों के तहत होने वाली कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी केवल एक प्रारंभिक तथ्य-जांच प्रक्रिया है और इसे चल रहे आपराधिक मुकदमे के दौरान भी जारी रखा जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह किसी समानांतर विभागीय कार्रवाई के समान नहीं है और इससे आरोपी कर्मचारी के बचाव पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

यह फैसला जस्टिस Sanjeev Kumar और जस्टिस Sanjay Parihar की डिवीजन बेंच ने सुनाया।

मामला क्या है

मामला BSF के एक सहायक कमांडेंट से जुड़ा है, जो श्रीनगर के हुमहामा स्थित STC एयरपोर्ट पर तैनात थे। वर्ष 2022 में उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायत के बाद BSF अधिकारियों ने उन्हें निलंबित कर दिया और BSF नियमों के तहत कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए। इसी बीच पुलिस द्वारा आपराधिक जांच और मुकदमा भी शुरू किया गया।

हाईकोर्ट में चुनौती

अधिकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि जब एक ही आरोपों पर आपराधिक मुकदमा चल रहा है, तो साथ में विभागीय जांच चलाना उनके बचाव को प्रभावित करेगा। हालांकि, एकल पीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चलने पर कोई रोक नहीं है।

इसके बाद अधिकारी ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।

कोर्ट की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने कहा कि BSF द्वारा शुरू की गई कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी अभी केवल प्रारंभिक तथ्य जुटाने की प्रक्रिया है। यह यह तय करने के लिए होती है कि आगे औपचारिक विभागीय कार्रवाई शुरू की जाए या नहीं। इसलिए इसे आपराधिक मुकदमे के समानांतर चलने से नहीं रोका जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारी को इस जांच में शामिल होना चाहिए। हालांकि उसे कोई भी ऐसा बयान देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जिससे वह खुद को दोषी ठहराए, और उसे चुप रहने का अधिकार भी है।

निलंबन पर भी राहत नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी का निलंबन विभागीय जांच के कारण नहीं बल्कि बलात्कार के आपराधिक मामले के कारण किया गया है। इसलिए निलंबन रद्द करने की मांग भी खारिज कर दी गई।

फैसला

डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

मामला: Akhand Prakash Shahi vs Union of India & Others
केस नंबर: LPA No. 275/2025 एवं LPA No. 288/2025

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