CISF जवान की बर्खास्तगी बरकरार, दिल्ली हाई कोर्ट ने अनुशासन पर दिया बड़ा फैसला
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक पूर्व कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए कहा है कि सशस्त्र बलों के कर्मियों से सामान्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में कहीं अधिक उच्च स्तर के अनुशासन और आचरण की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थान पर शराब पीना, हिंसक झगड़े में शामिल होना और बल की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना गंभीर कदाचार है, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी जैसी सजा पूरी तरह न्यायसंगत है।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी सीआईएसएफ के एक पूर्व कांस्टेबल की याचिका खारिज करते हुए की। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में बरी हो जाने मात्र से विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती, क्योंकि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच के उद्देश्य, साक्ष्य के मानदंड और प्रमाण का स्तर अलग-अलग होते हैं।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विभागीय जांच के दौरान स्वयं कर्मचारी ने सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने और झगड़े में शामिल होने की बात स्वीकार की थी। ऐसे में विभागीय अधिकारियों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने कहा कि सीआईएसएफ जैसे अनुशासित सशस्त्र बल देश के महत्वपूर्ण संस्थानों और प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं। इसलिए इनके कर्मियों का निजी आचरण भी जनता के विश्वास और बल की प्रतिष्ठा से सीधे जुड़ा होता है। यदि किसी जवान के व्यवहार से बल की छवि धूमिल होती है, तो उसके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई न केवल वैध बल्कि आवश्यक भी है।
यह मामला जनवरी 2018 का है। रिकॉर्ड के अनुसार, छुट्टी पर अपने गृह राज्य गए सीआईएसएफ कांस्टेबल ने अपने साथियों के साथ महाराष्ट्र के धोम बांध क्षेत्र में सार्वजनिक स्थान पर शराब का सेवन किया। इसके बाद वह एक हिंसक झगड़े में शामिल हो गया, जिसमें भारतीय सेना के एक जवान की मौत हो गई। घटना के बाद उसके खिलाफ हत्या सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई। इसके साथ ही सीआईएसएफ ने भी उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी।
विभागीय जांच में कांस्टेबल को सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने, मारपीट में शामिल होने और अपने आचरण से बल की छवि खराब करने का दोषी पाया गया, जिसके आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। विभागीय अपील और पुनरीक्षण याचिका में भी बर्खास्तगी का फैसला बरकरार रखा गया।
हालांकि बाद में सत्र न्यायालय ने आपराधिक मुकदमे में उसे बरी कर दिया, क्योंकि कई प्रमुख गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर गए थे। इसके बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में बरी होना विभागीय कार्रवाई को स्वतः अमान्य नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि यदि विभागीय जांच में आरोप पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध होते हैं, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी तरह वैध मानी जाएगी।

