कलर ब्लाइंडनेस के कारण CRPF कांस्टेबल की सेवा समाप्ति बरकरार, गुवाहाटी हाईकोर्ट का अहम फैसला
गुवाहाटी। गौहाटी हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक कांस्टेबल की सेवा समाप्ति को बरकरार रखा है। कांस्टेबल को वर्ष 2016 में कलर ब्लाइंडनेस पाए जाने के बाद सेवा से हटा दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ समय तक सेवा कर लेने और प्रशिक्षण पूरा कर लेने से कर्मचारी को लागू सेवा नीति के विपरीत सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं मिल जाता।
न्यायमूर्ति कौशिक गोस्वामी ने 12 अगस्त 2026 को दिए आदेश में कांस्टेबल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि CRPF एक सशस्त्र बल है, जहां कर्मियों को हथियारों के इस्तेमाल और जरूरत पड़ने पर ऑपरेशनल एवं कॉम्बैट ड्यूटी के लिए तैयार रहना होता है। इसलिए कलर ब्लाइंडनेस को लेकर लागू मेडिकल मानकों का पालन जरूरी है।
2014 में हुई थी CRPF में भर्ती
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता की नवंबर 2014 में CRPF की 11वीं बटालियन में कांस्टेबल (GD) के पद पर नियुक्ति हुई थी। इसके बाद उसने महाराष्ट्र में लगभग एक वर्ष का प्रशिक्षण पूरा किया और बाद में उसकी तैनाती झारखंड में की गई।
सेवा के दौरान वर्ष 2016 में मेडिकल जांच में उसके कलर ब्लाइंड होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद अप्रैल 2017 में उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उसका जवाब मिलने के बाद मई 2017 में CRPF ने उसकी सेवा समाप्त कर दी।
जवान ने मांगा था वैकल्पिक पद
कांस्टेबल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि कलर ब्लाइंडनेस का पता नियुक्ति के करीब दो वर्ष बाद चला। ऐसे में उसे सीधे सेवा से हटाने के बजाय किसी ऐसे वैकल्पिक पद पर नियुक्त किया जा सकता था, जहां रंगों की पहचान जरूरी न हो।
हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि गृह मंत्रालय की वर्ष 2013 की मेडिकल गाइडलाइंस के तहत कलर ब्लाइंडनेस CAPF और असम राइफल्स में भर्ती तथा सेवा जारी रखने के लिए अयोग्यता है।
भर्ती के समय दिया था लिखित अंडरटेकिंग
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि कांस्टेबल ने नियुक्ति के समय एक अंडरटेकिंग दी थी। इसमें उसने यह स्वीकार किया था कि यदि सेवा के दौरान किसी भी स्तर पर उसे कलर ब्लाइंड पाया जाता है तो निर्धारित नियमों के अनुसार उसे सेवा से बाहर किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति 2013 की गाइडलाइंस लागू होने के बाद हुई थी और उसने स्वयं इन शर्तों को स्वीकार किया था।
CRPF में वैकल्पिक गैर-कॉम्बैट पद का तर्क भी नहीं माना
अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि कांस्टेबल को किसी गैर-कॉम्बैट या दूसरे पद पर समायोजित किया जा सकता था। इस पर अदालत ने CRPF के इस पक्ष को स्वीकार किया कि बल में वर्तमान व्यवस्था के तहत सभी कर्मियों को हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है और आपात स्थिति में उन्हें कॉम्बैट ड्यूटी के लिए तैनात किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि केवल यह तथ्य कि कलर ब्लाइंडनेस का पता नियुक्ति के लगभग दो वर्ष बाद चला, लागू नीति को अप्रभावी नहीं कर देता। अदालत CRPF को मौजूदा नियमों के विपरीत कोई वैकल्पिक पद बनाने या उपलब्ध कराने का निर्देश भी नहीं दे सकती।
CAPF जवानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
गौहाटी हाईकोर्ट का यह फैसला CAPF में मेडिकल फिटनेस, कलर ब्लाइंडनेस और सेवा में बनाए रखने से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। फैसले में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि संबंधित मेडिकल नीति की वैधता को इस मामले में चुनौती नहीं दी गई थी और नियुक्ति के समय कर्मचारी द्वारा दिए गए अंडरटेकिंग का भी महत्व है।
यह फैसला ऐसे मामलों में यह संकेत देता है कि भर्ती के बाद कलर ब्लाइंडनेस का पता चलने पर भी केवल पहले की गई सेवा या प्रशिक्षण के आधार पर सेवा में बने रहने का स्वतः अधिकार नहीं बनता, यदि संबंधित सेवा नियम ऐसी स्थिति में सेवा समाप्ति का प्रावधान करते हैं।

