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ताड़मेटला नक्सली हमला केस: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 75 CRPF जवानों की शहादत मामले में 10 आरोपी किए बरी,जांच पर उठाए सवाल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 में सुकमा जिले के ताड़मेटला में हुए भीषण नक्सली हमले से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने जांच में गंभीर प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कानूनी रूप से स्वीकार्य और ठोस साक्ष्य पेश करने में विफल रहा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि 75 सीआरपीएफ जवानों और एक राज्य पुलिसकर्मी की शहादत के बावजूद वास्तविक अपराधियों की पहचान स्थापित नहीं हो सकी, जो बेहद पीड़ादायक है।

अदालत ने कहा कि इतने बड़े और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामले में भी जांच एजेंसियां आरोपियों के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाईं, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट को उन्हें बरी करना पड़ा। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यह फैसला भारी मन से सुनाया जा रहा है।

गौरतलब है कि 6 अप्रैल 2010 को बस्तर संभाग के सुकमा जिले के ताड़मेटला इलाके में माओवादियों ने सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे, जिनमें 75 सीआरपीएफ जवान और एक राज्य पुलिसकर्मी शामिल थे। नक्सलियों ने शहीद जवानों के हथियार भी लूट लिए थे। यह हमला देश के इतिहास में सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक नक्सली हमलों में से एक माना जाता है।

मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने 43 गवाह पेश किए और 156 दस्तावेज अदालत में दाखिल किए थे, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपी बरी कर दिए गए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने अपने 5 मई के आदेश में कहा कि सभी गवाह अपने बयान से मुकर गए थे और किसी भी गवाह ने आरोपियों की पहचान हमलावरों के रूप में नहीं की। अदालत ने यह भी पाया कि जब्त किए गए विस्फोटकों से संबंधित फॉरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की रिपोर्ट तक पेश नहीं की गई, जिससे बरामदगी से जुड़ा साक्ष्य कमजोर हो गया।

अदालत ने जांच को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि आर्म्स एक्ट के तहत आवश्यक अभियोजन स्वीकृति का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था और आरोपियों की पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) भी नहीं कराई गई।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य के बिना किसी भी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि भविष्य में सामूहिक जनहानि या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच अत्यंत सावधानी और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए की जाए।

साथ ही, अदालत ने जांच एजेंसियों की क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू करने के निर्देश भी दिए, ताकि भविष्य में ऐसी गंभीर जांच में लापरवाही की पुनरावृत्ति न हो।

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