छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने CRPF कांस्टेबल की बर्खास्तगी बरकरार रखी, 6 महीने से अधिक रहा था ड्यूटी से गैरहाजिर
रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ड्यूटी से छह महीने से अधिक समय तक अनुपस्थित रहने वाले CRPF कांस्टेबल को सेवा से हटाने के विभागीय आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि अनुशासित सशस्त्र बल के सदस्य को अनुचित या कमजोर आधार पर लंबे समय तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में नरमी बरतने से बल के अनुशासन और कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की पीठ 34 वर्षीय पूर्व CRPF कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2018 में हुई अपनी सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती दी थी।
2009 में हुई थी CRPF में नियुक्ति
याचिकाकर्ता की नियुक्ति मार्च 2009 में कांस्टेबल के पद पर हुई थी। आठ वर्ष से अधिक सेवा पूरी करने के बाद वह स्थायी कर्मचारी बन गया था। उसे 13 फरवरी से 14 मार्च 2017 तक एक महीने की मेडिकल छुट्टी मंजूर की गई थी।
छुट्टी की अवधि समाप्त होने के बाद उसने अपनी तबीयत खराब होने का हवाला देते हुए छह महीने की अतिरिक्त छुट्टी मांगी। इसके समर्थन में उसने मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन और प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए। हालांकि, अप्रैल 2017 में उसकी अतिरिक्त छुट्टी की मांग खारिज कर दी गई और उसे ड्यूटी पर वापस आने का निर्देश दिया गया।
मेडिकल दस्तावेजों पर उठे सवाल
कांस्टेबल का दावा था कि वह एनीमिया, नॉन-इक्टेरस हेपेटाइटिस और एंटेरिक फीवर से पीड़ित था और डॉक्टरों ने उसे छह महीने के बेड रेस्ट की सलाह दी थी।
हालांकि, CRPF अधिकारियों ने इन मेडिकल दस्तावेजों को संदिग्ध माना। कोर्ट ने भी रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि दस्तावेज उसकी स्वीकृत छुट्टी के अंतिम दिन तैयार किए गए थे और एक साथ छह महीने के मेडिकल रेस्ट की सिफारिश की गई थी।
विभाग के निर्देश के बावजूद कांस्टेबल ड्यूटी पर वापस नहीं आया और न ही इलाज के लिए CRPF अस्पताल, नागपुर में रिपोर्ट किया।
बार-बार निर्देश के बावजूद नहीं लौटा
अधिकारियों ने उसे कई बार ड्यूटी पर लौटने और विभागीय कार्रवाई में शामिल होने के निर्देश दिए, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। बाद में उसे ‘भगोड़ा’ (Absconder) घोषित किया गया और उसके खिलाफ वारंट भी जारी किया गया।
इसके बावजूद वह ड्यूटी पर नहीं लौटा। विभाग ने उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की और अंततः जून 2018 में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया। उसकी अपील वर्ष 2019 में खारिज कर दी गई, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।
प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक कुमार अग्रवाल ने तर्क दिया कि विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आदेश उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
वहीं CRPF की ओर से केंद्र सरकार की अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने कहा कि कांस्टेबल को ड्यूटी पर लौटने और विभागीय जांच में शामिल होने के कई अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने नोटिस का जवाब नहीं दिया और कार्यवाही में भाग नहीं लिया।
कोर्ट ने बर्खास्तगी को उचित माना
हाईकोर्ट ने कहा कि कांस्टेबल एक अनुशासित सशस्त्र बल का सदस्य था और उसकी जिम्मेदारियों को देखते हुए लंबे समय तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहना गंभीर मामला है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वह केवल छह महीने से अधिक समय तक अनधिकृत रूप से अनुपस्थित नहीं रहा, बल्कि अधिकारियों के बार-बार निर्देशों के बावजूद विभागीय कार्यवाही में भी शामिल नहीं हुआ।
अदालत ने माना कि उसे अपना पक्ष रखने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सेवा से हटाने का फैसला अत्यधिक या असंगत (excessive or disproportionate) नहीं कहा जा सकता। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए CRPF के बर्खास्तगी आदेश को बरकरार रखा।

