BSF के पूर्व जवान को हाईकोर्ट से बड़ी राहत: आतंकी हमले में लगी थी गोली, 17 साल बाद दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने BSF के पूर्व कांस्टेबल के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि देश की रक्षा करते हुए खून बहाने वाले जवान को कल्याणकारी राज्य बेसहारा नहीं छोड़ सकता। अदालत ने जवान की नवंबर 2009 की सेवानिवृत्ति को चिकित्सकीय आधार पर मानते हुए दिव्यांगता पेंशन देने का निर्देश दिया है।
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक पूर्व कांस्टेबल को दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया है। वर्ष 1991 में आतंकी हमले के दौरान गोली लगने से स्थायी रूप से दिव्यांग हुए इस जवान ने चोट के बावजूद करीब 21 साल तक अपनी सेवाएं जारी रखीं। हालांकि, नवंबर 2009 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्हें दिव्यांगता पेंशन का लाभ नहीं दिया गया।
28 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में न्यायमूर्ति प्रविंद्र सिंह चौहान ने कहा कि देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जोखिम उठाने वाले जवानों के बलिदान को विशेष पेंशन प्रावधानों के माध्यम से मान्यता दी जानी चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी की कि एक कल्याणकारी राज्य उस जवान को बेसहारा नहीं छोड़ सकता, जिसने आतंकी गतिविधियों के विरुद्ध देश की रक्षा करते हुए अपना खून बहाया हो।
1991 में आतंकी हमले के दौरान लगी थी गोली
मामले के अनुसार, पूर्व जवान वर्ष 1988 में BSF में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुए थे।
दिसंबर 1991 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर में आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी के दौरान आतंकियों ने BSF के एक वाहन पर हमला कर दिया। इस वाहन में सवार जवान के दाहिने हाथ में गोली लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
उन्हें फरवरी 1992 तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसके बाद जुलाई 1992 तक उनका इलाज जारी रहा।
इलाज के बाद उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ, लेकिन दाहिने हाथ में स्थायी विकृति रह गई। वर्ष 1996 में मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता 45 प्रतिशत निर्धारित की।
इसके बावजूद जवान ने अपनी ड्यूटी जारी रखी और निम्न मेडिकल श्रेणी में रहते हुए वर्षों तक BSF में सेवाएं दीं।
1998 में मिले थे केवल 12,412 रुपये
वर्ष 1998 में जवान ने अपनी दिव्यांगता के लिए मुआवजे की मांग की थी। इसके बाद उन्हें सरकारी सेवा के दौरान लगी चोट के आधार पर 12,412 रुपये की एकमुश्त क्षतिपूर्ति दी गई।
हालांकि, उन्हें नियमित दिव्यांगता पेंशन नहीं दी गई।
वर्ष 2009 में मेडिकल बोर्ड ने दोबारा उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जांच की। बोर्ड ने पाया कि जवान BSF में आगे किसी भी प्रकार की सेवा करने के लिए पूरी तरह और स्थायी रूप से अयोग्य हो चुके हैं।
पूर्व जवान के अनुसार, उन्हें आश्वासन दिया गया था कि उनका मामला चिकित्सकीय आधार पर सेवा से मुक्त करने की प्रक्रिया के तहत निपटाया जाएगा। इसी भरोसे पर उन्होंने सेवानिवृत्ति का अनुरोध किया।
नवंबर 2009 में वह 21 वर्ष, 7 महीने और 29 दिन की अर्हक सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हो गए। उन्हें सामान्य पेंशन स्वीकृत हुई और वह 15,500 रुपये पेंशन प्राप्त कर रहे थे।
दिव्यांगता पेंशन का दावा क्यों खारिज हुआ?
वर्ष 2018 में पूर्व जवान ने दिव्यांगता पेंशन की मांग करते हुए कानूनी नोटिस भेजा।
लेकिन संबंधित अधिकारियों ने दो प्रमुख आधारों पर उनका दावा खारिज कर दिया।
- जवान ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।
- उन्हें पहले ही 12,412 रुपये की एकमुश्त दिव्यांगता क्षतिपूर्ति मिल चुकी थी।
इसके बाद पूर्व जवान ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
पूर्व जवान की ओर से अधिवक्ता चंद्रहास यादव ने अदालत को बताया कि विभागीय रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि जवान को ड्यूटी के दौरान आतंकी हमले में गोली लगी थी और उनकी दिव्यांगता 45 प्रतिशत निर्धारित की गई थी।
उन्होंने कहा कि चिकित्सकीय आधार पर सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया पूरी करने का आश्वासन मिलने के बाद ही जवान ने सेवानिवृत्ति का अनुरोध किया था। इसके बावजूद उन्हें दिव्यांगता पेंशन से वंचित रखा गया।
दूसरी ओर, सरकार की ओर से वरिष्ठ पैनल अधिवक्ता पंकज गुप्ता ने दलील दी कि जवान पहले ही एकमुश्त क्षतिपूर्ति प्राप्त कर चुके हैं और उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। इसलिए वह दिव्यांगता पेंशन के पात्र नहीं हैं।
सरकार का कहना था कि संबंधित अधिकारियों ने लागू नियमों के अनुसार ही निर्णय लिया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जवान की दिव्यांगता सामान्य बीमारी या प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न नहीं हुई थी, बल्कि वह ड्यूटी के दौरान आतंकी हमले में गोली लगने से हुई थी।
अदालत ने माना कि यह चोट सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए की गई सेवा के दौरान उठाया गया एक स्थायी शारीरिक कष्ट है।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि गंभीर चोट और स्थायी दिव्यांगता के बावजूद जवान ने कई वर्षों तक अपनी सेवाएं जारी रखीं।
बाद में BSF के अपने मेडिकल बोर्ड ने ही उन्हें आगे की सेवा के लिए स्थायी रूप से अयोग्य घोषित किया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य सेवानिवृत्ति लाभ मिलने का अर्थ यह नहीं है कि किसी जवान को अलग से देय दिव्यांगता पेंशन से वंचित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट का आदेश: नवंबर 2009 से चिकित्सकीय सेवानिवृत्ति मानी जाए
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि पूर्व जवान की नवंबर 2009 की सेवानिवृत्ति को चिकित्सकीय आधार पर हुई सेवानिवृत्ति माना जाए।
साथ ही, मेडिकल बोर्ड द्वारा निर्धारित 45 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए उन्हें नियमानुसार दिव्यांगता पेंशन प्रदान की जाए।
इस आदेश के साथ अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि देश की सुरक्षा में ड्यूटी के दौरान गंभीर चोट झेलने वाले जवानों के वैधानिक पेंशन अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
CAPF जवानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला विशेष रूप से उन CAPF जवानों के लिए महत्वपूर्ण है, जो ड्यूटी के दौरान घायल होने या स्थायी दिव्यांगता के बावजूद वर्षों तक सेवा करते हैं।
अदालत की टिप्पणियों से तीन महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सामने आते हैं:
- ड्यूटी के दौरान लगी चोट और उससे उत्पन्न दिव्यांगता का मूल्यांकन संबंधित विशेष पेंशन नियमों के अनुसार किया जाना चाहिए।
- पहले एकमुश्त क्षतिपूर्ति या सामान्य पेंशन मिलना, अपने आप में अलग से देय दिव्यांगता पेंशन को अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
- मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और सेवानिवृत्ति की वास्तविक परिस्थितियां पेंशन पात्रता तय करने में महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, प्रत्येक मामले में दिव्यांगता पेंशन की पात्रता संबंधित सेवा नियमों, मेडिकल रिकॉर्ड और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला बताता है कि देश की सुरक्षा में घायल हुए जवानों के पेंशन अधिकारों का निर्धारण केवल सेवानिवृत्ति के कागजी वर्गीकरण के आधार पर नहीं किया जा सकता। ड्यूटी के दौरान लगी चोट, स्थायी दिव्यांगता और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट जैसे तथ्यों पर भी उचित विचार करना आवश्यक है।
NEWS OF PARAMILITARY | CAPF NEWS
स्रोत: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 28 अक्टूबर 2026 के आदेश पर आधारित द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट।

