देश की सेवा कोई एहसान नहीं’: कलकत्ता हाईकोर्ट ने छुट्टी के बाद ड्यूटी पर न लौटने वाले BSF जवान की बर्खास्तगी को रखा बरकरार
कोलकाता: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक कांस्टेबल की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सेना या सुरक्षा बलों का कोई भी जवान देश की सेवा करके कोई एहसान नहीं कर रहा है, क्योंकि उसे इस काम के लिए वेतन दिया जाता है।
मामला क्या है?
यह मामला एक BSF कांस्टेबल से जुड़ा है जिसे फरवरी 2023 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। जवान अक्टूबर 2022 में छुट्टी खत्म होने के बाद वापस ड्यूटी पर नहीं लौटा। विभाग ने उसे तीन बार नोटिस भेजे और फरवरी 2023 में एक प्रतिनिधि को उसके घर भी भेजा, लेकिन वह ड्यूटी पर हाजिर नहीं हुआ।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस अमृता सिन्हा ने 27 अप्रैल को दिए अपने आदेश में कहा:
“याचिकाकर्ता देश पर कोई एहसान नहीं कर रहा था; उसे दी जाने वाली सेवाओं के लिए भुगतान किया जा रहा था। बल के एक सदस्य से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपनी मर्जी से जब चाहे तब ड्यूटी छोड़ दे और गायब हो जाए।”
अदालत ने आगे कहा कि अनुशासनहीनता और लापरवाह रवैये को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अगर बल का कोई सदस्य बिना किसी ठोस कारण के अचानक गायब हो जाता है, तो वरिष्ठ अधिकारियों के लिए अनुशासन बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता है।
पुराना रिकॉर्ड भी रहा खराब
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि याचिकाकर्ता पहले भी कई बार बिना बताए छुट्टी से ज्यादा समय तक गायब (Overstay) रहा था।
- कम से कम 5 बार अधिकारियों ने उसकी ऐसी अनुपस्थिति को माफ कर नियमित किया था।
- साल 2000 में वह 105 दिनों तक गायब रहा, जिसके लिए उसे 10 दिन की कठोर कैद की सजा मिली थी।
- साल 2021 में वह 108 दिनों तक बिना बताए गायब रहा, जिसके लिए उसे 14 दिन की कैद भुगतनी पड़ी थी।
अदालत ने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि जवान अपनी ड्यूटी के प्रति समर्पित नहीं था और वह बल के लिए एक “बोझ” बन चुका था।
प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का तर्क खारिज
जवान के वकीलों ने तर्क दिया था कि उसे जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए और यह ‘प्राकृतिक न्याय’ का उल्लंघन है। हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि उसे बार-बार मौके दिए गए थे। जवान ने दावा किया था कि वह 4 फरवरी 2023 को ज्वाइन करने गया था लेकिन उसे अनुमति नहीं मिली, पर कोर्ट में वह इसका कोई सबूत पेश नहीं कर सका।
अनुशासन सर्वोपरि
जस्टिस सिन्हा ने स्पष्ट किया कि BSF जैसी अनुशासित फोर्स में इस तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। यदि ऐसे मामलों में नरमी दिखाई गई, तो अन्य सदस्यों के बीच अनुशासन बनाए रखना एक चुनौती बन जाएगा। अदालत ने बर्खास्तगी के आदेश में किसी भी प्रकार की गलती न पाते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

