CAPF के कैडर अधिकारियों को ‘सुप्रीम’ जीत के बावजूद लाभ नहीं,सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर
नई दिल्ली: केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) के लगभग 20,000 कैडर अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से मिली ‘सुप्रीम’ जीत के छह महीने बाद भी पदोन्नति और वित्तीय फायदे नहीं मिल पाए हैं। इसकी मुख्य वजह केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस संबंध में कोई दिशा-निर्देश जारी न करना है। नतीजतन, अधिकारियों ने अब सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की है।
🗓️ सुप्रीम कोर्ट का फैसला और केंद्र की inaction
- फैसला: सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में आईटीबीपी, सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, और एसएसबी सहित सभी CAPF में छह महीने के भीतर कैडर समीक्षा करने का निर्देश दिया था। यह समीक्षा मूल रूप से 2021 के लिए निर्धारित थी।
- अन्य निर्देश: न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को आदेश दिया था कि वह गृह मंत्रालय से कार्रवाई रिपोर्ट मिलने के तीन महीने के भीतर कैडर समीक्षा और मौजूदा सेवा नियमों व भर्ती नियमों की समीक्षा पर उचित निर्णय ले।
- मामले का आधार: 23 मई 2025 का यह फैसला गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (NFFU), कैडर समीक्षा, और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने के लिए भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली याचिकाओं पर आया था।
- अनदेखी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के छह माह बाद भी संबंधित मंत्रालय ने कोई आवश्यक कार्रवाई नहीं की।
- रिव्यू पिटीशन: केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन में चली गई, जिसे 28 अक्टूबर को जस्टिस सूर्यकांत (अब चीफ जस्टिस) और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने खारिज (Dismiss) कर दिया।
अनदेखी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के छह माह बाद भी संबंधित मंत्रालय ने कोई आवश्यक कार्रवाई नहीं की।
रिव्यू पिटीशन: केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन में चली गई, जिसे 28 अक्टूबर को जस्टिस सूर्यकांत (अब चीफ जस्टिस) और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने खारिज (Dismiss) कर दिया।
🚨 प्रतिनियुक्ति और पदोन्नति में गतिरोध
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम करने को कहा था। हालांकि, पिछले छह महीनों में सीएपीएफ में डीआईजी के पदों पर आईपीएस अफसरों की तैनाती में तेजी देखने को मिली है।
- SAG ग्रेड में देरी: सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई थी कि केंद्र की ‘समूह-ए’ सेवा में जहां 19-20 वर्षों में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) मिल रहा है, वहीं केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में इसे पाने में 36 वर्ष तक लग रहे हैं।
- ओजीएएस का मुद्दा: सुप्रीम कोर्ट ने इन बलों में ‘संगठित समूह ए सेवा’ (OGAS) को सही मायने में लागू करने और इसे केवल NFFU के लिए नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए ‘ओजीएएस पैटर्न’ लागू करने को कहा था।
- पदोन्नति में ठहराव: बीएसएफ और सीआरपीएफ में 2016 से कैडर रिव्यू नहीं हुआ है। यूपीएससी से सेवा में आए ग्राउंड कमांडर यानी सहायक कमांडेंट को 15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं मिल रही है।
- अधिवक्ता की राय: सीआरपीएफ के पूर्व एसी और अधिवक्ता सर्वेश त्रिपाठी के अनुसार, कैडर अधिकारियों के पास अब अवमानना याचिका दायर करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था, क्योंकि केंद्र सरकार सकारात्मक रुख नहीं अपना रही है।
📜 इतिहास और भविष्य की मांग
पूर्व कैडर अधिकारियों के मुताबिक, कैडर अफसरों को नेतृत्व के अवसर न मिल पाने की मुख्य वजह आईपीएस की प्रतिनियुक्ति है।
- पुराना विरोध: 1970 में तत्कालीन गृह सचिव लल्लन प्रसाद सिंह और बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न करने की सलाह दी थी, ताकि कैडर अधिकारियों को नेतृत्व का मौका मिल सके। 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
- डीओपीटी नियम: डीओपीटी के नियम के अनुसार, हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू होना चाहिए।
- पूर्व एडीजी की चिंता: बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, 10 लाख से अधिक की संख्या वाले केंद्रीय बलों में करीब 20 हजार कैडर अफसरों के लिए पदोन्नति के अवसर बहुत कम हैं। इस धीमी रफ्तार से वे कमांडेंट के पद से ही रिटायर हो जाएंगे।
कैडर अधिकारी अब मांग कर रहे हैं कि अदालत के आदेशानुसार ओजीएएस को पूर्ण रूप से लागू किया जाए, कैडर रिव्यू तुरंत हो, और आईपीएस की प्रतिनियुक्ति समाप्त की जाए ताकि उन्हें 15 साल के लंबे इंतजार के बाद पहली पदोन्नति मिल सके और वे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच सकें।
(SOURCE – AMAR UJALA)

