CAPF कैडर अफसर सुप्रीम कोर्ट में जीत के बावजूद पदोन्नति और वित्तीय लाभ न मिलने से चिंतित। अवमानना याचिका की तैयारी।
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) के लगभग 20,000 कैडर अधिकारियों में गहरी चिंता का माहौल है। सुप्रीम कोर्ट में बार-बार जीत मिलने के बावजूद, पदोन्नति और वित्तीय लाभ के मामलों में अब तक कोई वास्तविक सुधार नजर नहीं आया है। मुख्य वजह—केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर ठोस कार्रवाई न होना।
28 अक्टूबर को रिव्यू पिटीशन खारिज—फिर भी सन्नाटा
मई 2025 में सर्वोच्च अदालत ने कैडर अधिकारियों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि छह महीने के भीतर ‘संगठित समूह-ए सेवा’ (OGAS) का पैटर्न सीएपीएफ में पूरी तरह लागू किया जाए। साथ ही, केंद्रीय बलों में आईपीएस प्रतिनियुक्ति धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि इस दौरान केंद्र सरकार ने रिव्यू पिटीशन दायर कर दी, जिसे 28 अक्टूबर को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने खारिज कर दिया। इसके बावजूद मंत्रालय में कोई हलचल नहीं दिखी। उल्टा, पिछले छह महीनों में डीआईजी स्तर पर आईपीएस तैनाती और तेजी से बढ़ गई।
नतीजा—कैडर अधिकारी अब सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।
मई का ऐतिहासिक फैसला—लेकिन अमल ठप
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि:
- सीएपीएफ को सही मायने में ‘संगठित समूह-ए सेवा’ का दर्जा मिले।
- केवल एनएफएफयू नहीं, बल्कि सभी मामलों में OGAS लागू हो।
- छह महीने में कैडर रिव्यू पूरा किया जाए।
- आईपीएस प्रतिनियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से कम किया जाए।
फिर भी, स्थिति जस की तस बनी हुई है।
15 साल में पहली पदोन्नति भी नहीं
पूर्व सहायक कमांडेंट व अधिवक्ता सर्वेश त्रिपाठी कहते हैं—
“सरकार सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू नहीं करना चाहती। 2016 से बीएसएफ और सीआरपीएफ में कैडर रिव्यू नहीं हुआ। यूपीएससी से आए ग्राउंड कमांडरों को 15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं मिल रही।”
डीओपीटी के अनुसार हर पांच साल में कैडर रिव्यू अनिवार्य है, लेकिन सीएपीएफ में 9–10 साल से यह प्रक्रिया नहीं हुई।
सीनियर ग्रेड तक पहुंचने में 36 साल!
27 फरवरी की सुनवाई में जस्टिस अभय ओका ने कहा था:
- केंद्र सरकार के ग्रुप-ए अफसरों को 19–20 साल सेवा में ‘सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड’ (SAG) मिल जाता है।
- वहीं सीएपीएफ अफसरों को इस ग्रेड तक पहुंचने में 35–36 साल लग रहे हैं।
यह असमानता कैडर अफसरों के करियर को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
“भूमिका विशाल, अधिकार सीमित”
पूर्व बीएसएफ एडीजी एसके सूद का कहना है:
- सीएपीएफ में सभी रैंकों को मिलाकर 10 लाख से अधिक कर्मी हैं।
- इनमें 20,000 कैडर अफसर हैं, जिन्हें नेतृत्व और पदोन्नति के सीमित अवसर मिलते हैं।
- कैडर अधिकारी वर्षों तक मैदान में जटिल ऑपरेशंस संभालते हैं, लेकिन नीति-निर्माण में उनकी भूमिका न्यूनतम रहती है।
1986 से OGAS मान्यता—फिर भी लाभ नहीं
- 1986 से केंद्र ने सीएपीएफ को OGAS माना था।
- 2006 के वेतन आयोग ने एनएफएफयू की सिफारिश की, लेकिन इसे भी लागू नहीं किया गया।
- नतीजा—कई अफसर 15–20 साल तक बिना पदोन्नति के फंसे रह गए।
स्थिति यह है कि सैकड़ों अफसरों में से मुश्किल से एक-दो ही एडीजी तक पहुंच पाते हैं।
आईपीएस प्रतिनियुक्ति क्यों बड़ा मुद्दा?
कैडर अफसरों के अनुसार:
- आईपीएस अधिकारी राज्य पुलिस से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं।
- उन्हें अर्धसैनिक बलों के संचालन का फील्ड अनुभव कम होता है।
- उनकी तैनाती के कारण कैडर अफसरों की पदोन्नति अवरुद्ध हो जाती है।
- सेना से प्रतिनियुक्त अधिकारी पहले आते थे, लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों पहले बंद कर दी गई—केवल आईपीएस प्रतिनियुक्ति जारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे खत्म किया जाए, पर इसका पालन नहीं हो रहा।
जड़ें इतिहास में: 1955 के एक्ट में भी आरक्षण नहीं
दस्तावेज बताते हैं कि:
- 1955 के फोर्स एक्ट में आईपीएस के लिए कोई आरक्षित पद नहीं था।
- 1960 के दशक में बीएसएफ और सीआरपीएफ ने अपने अफसर तैयार करने की सिफारिश की।
- कई डीजी और गृह सचिवों ने भी कहा था कि बलों को अपने कैडर अफसरों द्वारा ही संचालित किया जाना चाहिए।
फिर भी धीरे-धीरे महत्वपूर्ण पदों पर आईपीएस का आरक्षण स्थापित कर दिया गया।
अब आगे क्या?
कैडर अधिकारी मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद अब केवल एक ही रास्ता बचा है—
अवमानना याचिका।
उनकी मांगें:
- कैडर रिव्यू तुरंत किया जाए
- OGAS पूरी तरह लागू हो
- आईपीएस प्रतिनियुक्ति चरणबद्ध तरीके से खत्म हो
- लंबित पदोन्नति और वित्तीय लाभ तुरंत दिए जाएं
सुप्रीम कोर्ट में लगातार जीत के बावजूद वास्तविक बदलाव न होना सीएपीएफ कैडर अफसरों के आक्रोश और बेचैनी का बड़ा कारण है।
अगर सरकार आदेशों का पालन नहीं करती, तो आने वाले महीनों में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक नई कानूनी लड़ाई का रूप ले सकता है—और यह संघर्ष वर्षों से पदोन्नति और पहचान की प्रतीक्षा कर रहे हजारों अफसरों के भविष्य को प्रभावित करेगा।

