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सुप्रीम कोर्ट ने CRPF को लगाई फटकार, दिव्यांगता के आधार पर नौकरी से हटाए गए पूर्व ड्राइवर को 1.25 करोड़ रुपये मुआवज़ा देने का आदेश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) को कड़ी फटकार लगाते हुए दिव्यांगता के आधार पर सेवा से हटाए गए एक पूर्व कॉन्स्टेबल (ड्राइवर) के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए पूर्व जवान को बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमे के खर्च सहित कुल 1.25 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि CRPF एक “आदर्श नियोक्ता (Model Employer)” के रूप में अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांगता हो जाती है, तो उसे नौकरी से हटाने के बजाय समान वेतन और सेवा लाभ वाली किसी अन्य उपयुक्त पोस्ट पर समायोजित किया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

मामला पूर्व CRPF कॉन्स्टेबल (ड्राइवर) बाली राम से जुड़ा है। सेवा के दौरान उनकी आंखों में गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई, जिसके बाद 11 मार्च 1998 को उन्हें मेडिकल आधार पर ड्यूटी के लिए अयोग्य घोषित कर सेवा से अलग कर दिया गया।

बाली राम ने इस फैसले को चुनौती दी थी। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि CRPF ने ‘Persons with Disabilities (Equal Opportunities, Protection of Rights and Full Participation) Act, 1995’ की धारा 47 का उल्लंघन किया है। इसके बाद केंद्र सरकार इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

हालांकि, चूंकि बाली राम अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सेवा में बहाल करने के बजाय आर्थिक मुआवजा देने का आदेश दिया।

धारा 47 को बताया अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि PwD Act, 1995 की धारा 47 पूरी तरह अनिवार्य है और इसका उद्देश्य दिव्यांग कर्मचारियों को समान अवसर, अधिकारों की सुरक्षा और उचित व्यवस्था (Reasonable Accommodation) उपलब्ध कराना है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी को नौकरी के दौरान दिव्यांगता होती है, तो सरकारी संस्थान उसे सेवा से नहीं हटा सकते। ऐसे कर्मचारी को समान वेतन और सुविधाओं वाली दूसरी पोस्ट पर नियुक्त किया जाना चाहिए। यदि उपयुक्त पद उपलब्ध न हो तो उसके लिए सुपरन्यूमरेरी पोस्ट (Supernumerary Post) भी बनाई जा सकती है।

CRPF की दलील नहीं मानी

केंद्र सरकार ने दलील दी कि वर्ष 2002 की एक अधिसूचना के तहत CRPF के कॉम्बैटेंट कर्मचारियों को PwD Act की धारा 47 से छूट दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि संबंधित कर्मचारी को वर्ष 1998 में मेडिकल आधार पर अयोग्य घोषित किया गया था, जबकि यह अधिसूचना 2002 में जारी हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधीनस्थ कानून (Delegated Legislation) को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू नहीं किया जा सकता।

CRPF को खुद तलाशनी चाहिए थी वैकल्पिक पोस्ट”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PwD Act के तहत वैकल्पिक नियुक्ति देना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी थी। अदालत ने टिप्पणी की कि CRPF को कर्मचारी के आवेदन का इंतजार नहीं करना चाहिए था, बल्कि स्वयं उसके लिए उपयुक्त पद तलाशना चाहिए था।

पीठ ने कहा कि ऐसा न करके CRPF ने एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया और कल्याणकारी कानून के उद्देश्य को कमजोर किया।

केस विवरण

मामला: Union of India & Others vs. Bali Ram
सिविल अपील संख्या: 13783/2015

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Editorial Desk – News of Paramilitary

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