राजस्थान हाईकोर्ट : 29 साल बाद BSF पूर्व जवान को मिली पेंशन, बेटे ने वकील बनकर जीता केस
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक पूर्व जवान को बड़ी राहत देते हुए करीब 29 वर्षों से रुकी हुई पेंशन बहाल करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस मामले की सबसे प्रेरणादायक बात यह रही कि पूर्व जवान के बेटे ने अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए खुद वकालत की पढ़ाई की और अदालत में उनकी पैरवी कर जीत हासिल की।
हाईकोर्ट का अहम फैसला
जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की एकल पीठ ने 2 अप्रैल को सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता रामजी लाल (58) के पक्ष में निर्णय दिया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि—
- पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) तुरंत लागू किया जाए
- 6 दिसंबर 1997 से अब तक की संपूर्ण बकाया पेंशन (एरियर) का भुगतान किया जाए
- आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर भुगतान और सभी सेवानिवृत्ति लाभ सुनिश्चित किए जाएं
बीएसएफ जवान की सेवा और पेंशन विवाद
हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव ललाना निवासी रामजी लाल ने बीएसएफ में कॉन्स्टेबल के रूप में देश की सीमाओं पर कठिन परिस्थितियों में सेवा दी। उन्होंने बॉर्डर पेट्रोलिंग, सीमा पार अपराधों की रोकथाम और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे जोखिम भरे कार्यों में 10 वर्ष से अधिक की निष्कलंक सेवा दी।
उन्होंने बीएसएफ रूल्स-1969 के नियम 19 के तहत त्यागपत्र दिया था, जिसे विभाग ने 6 दिसंबर 1997 को स्वीकार कर लिया। उस समय केंद्र सरकार के 27 दिसंबर 1995 के आदेश के अनुसार 10 वर्ष की सेवा पूरी करने पर अनुपातिक पेंशन का प्रावधान लागू था।
इसी आधार पर उनका PPO जारी भी हुआ, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से उन्हें दशकों तक पेंशन का लाभ नहीं मिल सका।
पिता के संघर्ष ने बेटे को बनाया वकील
इस कानूनी लड़ाई का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पक्ष रहा रामजी लाल के बेटे एडवोकेट विचित्र चौधरी का संघर्ष। पिता की आर्थिक और मानसिक पीड़ा को देखते हुए उन्होंने वर्ष 2019 में लॉ की पढ़ाई पूरी की और खुद केस लड़ने का फैसला किया।
करीब चार वर्षों तक अदालत में प्रभावी पैरवी करते हुए उन्होंने साबित किया कि उनके पिता का मामला पूर्व के नजीरी फैसले ‘बनवारी लाल बनाम भारत संघ’ से पूरी तरह कवर होता है।
संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा
एडवोकेट चौधरी ने अदालत में दलील दी कि—
किसी सैनिक को केवल तकनीकी आधार पर पेंशन से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि पेंशन न मिलने से उनके पिता ने वर्षों तक मानसिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना किया।
सरकार के आदेश पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि सरकार ने 1995 में 10 साल सेवा पर पेंशन देने का उदार आदेश जारी किया था, लेकिन बाद में 1998 के परिपत्रों के जरिए नियमों को पिछली तारीख से लागू करने की कोशिश की गई।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 19 के तहत दिया गया त्यागपत्र वास्तव में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के समान है और एक बार प्राप्त अधिकार को बाद के स्पष्टीकरण से छीना नहीं जा सकता।
तीन महीने में एरियर भुगतान का आदेश
कोर्ट ने निर्देश दिया कि 9 अगस्त 1996 के PPO को प्रभावी करते हुए—
- 6 दिसंबर 1997 से अब तक की पूरी बकाया राशि दी जाए
- पेंशन की निरंतरता सुनिश्चित की जाए
- सभी लाभों की गणना तीन महीने में पूरी हो
