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CAPF बिल 2026 पर राज्यसभा में हंगामा,विपक्ष ने सरकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने’ का लगाया आरोप

नई दिल्ली:
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) से जुड़े सामान्य प्रशासन विधेयक, 2026 को लेकर राज्यसभा में सोमवार को तीखी बहस देखने को मिली। विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया कि नया विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जिसमें सीएपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्देश दिया गया था।

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने कहा कि सीएपीएफ कर्मियों ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन उन्हें नेतृत्व और पदोन्नति के अवसरों से वंचित किया जा रहा है। विपक्ष ने मांग की कि बिल को संसद की प्रवर समिति के पास भेजा जाए या विपक्ष द्वारा सुझाए गए संशोधनों को इसमें शामिल किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मुद्दा उठा

द्रमुक सांसद तिरुचि शिवा ने सदन में कहा कि वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं सीएपीएफ कैडर संरचना में मौजूद विसंगतियों को दूर करने और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने का आश्वासन दिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने उस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए।

उन्होंने बताया कि सीएपीएफ अधिकारियों द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय को दो वर्षों के भीतर आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। शिवा ने सवाल उठाया कि क्या सीएपीएफ के अधिकारी अपनी ही यूनिट का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं हैं।

पदोन्नति में भेदभाव का आरोप

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा कि यह विधेयक सीएपीएफ कर्मियों के साथ अन्याय करेगा। उन्होंने पदोन्नति में असमानता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि 2010 में भर्ती हुए सीआरपीएफ के कई सहायक कमांडेंट 15 वर्षों बाद भी पदोन्नति से वंचित हैं, जबकि 2012 बैच के आईपीएस अधिकारियों को 13 वर्षों में चार पदोन्नति मिल जाती हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि सीएपीएफ अधिकारियों को समान अवसर देने की मांग कर रहा है।

संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप

तृणमूल कांग्रेस के सांसद मोहम्मद नदीमुल हक ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक संस्थागत संतुलन को प्रभावित करता है। उनके अनुसार यह कदम न्यायपालिका की भावना के विपरीत है और राज्यों की भूमिका को भी सीमित करता है।

सीएपीएफ अधिकारियों ने गृह मंत्री को लिखा पत्र

इसी बीच अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर विधेयक पर पुनर्विचार की मांग की है। अधिकारियों ने आशंका जताई कि नए प्रावधान लागू होने पर वे अपने ही संगठन में “द्वितीय श्रेणी के नागरिक” बनकर रह जाएंगे।

2011 से 2016 बैच के अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र में कहा गया है कि विधेयक के जरिए शीर्ष पदों को प्रतिनियुक्ति पर आने वाले आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित किया जा रहा है, जिससे कैडर अधिकारियों के लिए नेतृत्व के अवसर सीमित हो जाएंगे। अधिकारियों ने इसे “ग्लास सीलिंग” बताते हुए कहा कि अनुभव और विशेषज्ञता के बजाय प्रशासनिक संरक्षण को प्राथमिकता देना बलों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।

सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार इसे प्रशासनिक सुधार बता रही है, वहीं विपक्ष और बलों के अधिकारी इसे कैडर हितों के खिलाफ बताते हुए व्यापक समीक्षा की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर बहस और तेज होने के संकेत हैं।

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