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11 दिन की गैरहाजिरी पर बर्खास्त CISF कांस्टेबल को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लगाई फटकार और 25 हजार का जुर्माना

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर सरकार के अनावश्यक मुकदमेबाजी के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार स्वयं सरकार है, जो छोटे-छोटे मामलों को भी उच्चतम न्यायालय तक ले आती है।

CISF कांस्टेबल की बर्खास्तगी का मामला

मामला केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक कांस्टेबल से जुड़ा है, जिसे बिना सूचना 11 दिन तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बताया गया कि कांस्टेबल अपने सहकर्मी की बेटी की शादी में मदद करने के कारण ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो पाया था।

कांस्टेबल ने इस कार्रवाई को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि केवल 11 दिन की अनुपस्थिति के लिए नौकरी से बर्खास्त करना अत्यधिक कठोर सजा है। अदालत ने कांस्टेबल की सेवा बहाल करने और उसे 25 प्रतिशत पिछला वेतन देने का आदेश दिया।

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरकार

हाई कोर्ट के आदेश को स्वीकार करने के बजाय केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सरकार अदालतों में लंबित मामलों का रोना रोती है, जबकि वास्तविकता यह है कि सरकार खुद सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। अदालत ने सवाल किया कि जब हाई कोर्ट ने संतुलित फैसला दे दिया था, तो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

सरकार पर लगाया गया जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि अदालत का कीमती समय अनावश्यक रूप से बर्बाद किया गया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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