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25 साल बाद शहीद CRPF अधिकारी की पत्नी को मिला न्याय, केंद्र सरकार पर ₹2 लाख जुर्माना

रांची हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए शहीद CRPF अधिकारी की पत्नी को 25 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय दिलाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि एक गरीब विधवा को न्याय के लिए चौथाई सदी तक अदालतों के चक्कर लगवाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाते हुए शहीद अधिकारी की पत्नी बिंदेश्वरी मिश्रा को लिबरलाइज्ड पेंशनरी अवार्ड (LPA) योजना का लाभ देने का आदेश दिया।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने केंद्र की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला पहले ही निपट चुका था और सीआरपीएफ द्वारा बार-बार एक ही मुद्दे पर याचिका दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

🔹 क्या है पूरा मामला

शहीद कैप्टन रवींद्र नाथ मिश्रा, जो सीआरपीएफ में डिप्टी एसपी (कंपनी कमांडर) थे, की 4 मार्च 1995 को असम के अमगुड़ी में ड्यूटी के दौरान अपने ही कैंप में एक कांस्टेबल द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

इसके बाद उनकी पत्नी बिंदेश्वरी मिश्रा को 1996 में मात्र ₹470 मासिक पारिवारिक पेंशन दी गई। उन्होंने आपत्ति जताई कि उनके पति की मौत ड्यूटी के दौरान हुई थी, इसलिए उन्हें एलपीए योजना के तहत लाभ मिलना चाहिए।

जब विभाग ने कार्रवाई नहीं की, तो उन्होंने 1999 में पटना हाई कोर्ट (रांची बेंच) में याचिका दाखिल की।
2000 में कोर्ट ने सीआरपीएफ डीजी को आदेश दिया कि मामला निपटाया जाए, लेकिन आदेश की अनदेखी की गई।

🔹 लंबी कानूनी जंग

  • 2008: एकल पीठ ने विधवा के पक्ष में फैसला दिया।
  • 2010: डिवीजन बेंच ने भी आदेश बरकरार रखा।
  • 2011: केंद्र सरकार और सीआरपीएफ ने आदेश मानने से इनकार किया।
  • 2024: एकल पीठ ने सरकार के रवैये को “मनमाना और अमानवीय” बताते हुए फिर से विधवा के पक्ष में फैसला सुनाया।
  • इसके खिलाफ केंद्र ने फिर अपील की, जिसे 2025 में खंडपीठ ने खारिज कर दिया और सरकार पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया।

🔹 अदालत की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि सरकार और उसकी एजेंसियों को “लड़ाकू पक्षकार की तरह नहीं, बल्कि निष्पक्ष और न्यायसंगत तरीके से काम करना चाहिए।”
सीआरपीएफ अधिकारियों को अपनी गलती स्वीकार कर लेनी चाहिए थी, पर उन्होंने “अड़ियल रवैया” अपनाया और एक असमान लड़ाई लड़ी — “एक ओर एक सार्वजनिक संस्थान और दूसरी ओर एक गरीब विधवा।


🔹 अधिवक्ता की दलील

प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता समावेश भंजदेव ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि यह मामला न्यायिक धैर्य और विधिक संघर्ष का उदाहरण है, जहां एक शहीद की पत्नी ने 25 साल बाद अपना हक पाया।

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