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दिल्ली हाईकोर्ट ने BSF सब-इंस्पेक्टर की बर्खास्तगी बरकरार रखी, सहकर्मी की पत्नी से अवैध संबंध के आरोप साबित

सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक सब-इंस्पेक्टर को सहकर्मी की पत्नी से अवैध संबंध बनाने के मामले में बर्खास्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने जवान की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए कहा कि ऐसा आचरण बल की गरिमा और अनुशासन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे सशस्त्र बलों की साख पर सार्वजनिक विश्वास कमजोर होता है।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने कहा,

“हम याचिकाकर्ता के उस आचरण को नजरअंदाज नहीं कर सकते जो न केवल अनैतिक है बल्कि उस व्यक्ति के लिए अनुपयुक्त भी है जो देश की सुरक्षा की गंभीर जिम्मेदारी निभा रहा है। इस तरह का व्यवहार सशस्त्र बलों की ईमानदारी और नैतिक मूल्यों पर जनता के भरोसे को कमजोर करता है।”

मामले के अनुसार, संबंधित सब-इंस्पेक्टर ने अपने ही कैंप परिसर में रहने वाले एक कांस्टेबल की पत्नी (सुश्री X) के साथ व्हाट्सएप पर बातचीत शुरू की और बाद में उसके पति की अनुपस्थिति में उसके घर जाने लगा। बीएसएफ ने इस पर जांच बैठाई और कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने चैट रिकॉर्ड, वीडियो कॉल स्क्रीनशॉट्स और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को सिद्ध पाया।

बल की अनुशासनहीनता और नैतिक आचरण के उल्लंघन को देखते हुए जनरल सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट (GSFC) ने जवान को सेवा से बर्खास्त करने का आदेश दिया, जिसे बाद में बीएसएफ के महानिदेशक (DG BSF) ने भी बरकरार रखा।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में आरोपों से इनकार किया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह समझ से परे है कि बिना किसी औपचारिक या पारिवारिक संबंध के, याचिकाकर्ता ने अपने सहकर्मी की पत्नी को उपहार क्यों दिए।

कोर्ट ने कहा —

“जब किसी विवाहित व्यक्ति द्वारा किसी अन्य विवाहित व्यक्ति (जो उसकी जीवनसंगिनी नहीं है) को उपहार दिए जाते हैं, तो बिना किसी वैध कारण के ऐसा व्यवहार असामान्य माना जाता है और इसके लिए उचित स्पष्टीकरण आवश्यक है।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीएसएफ अधिनियम के तहत जीएसएफसी द्वारा किए गए परीक्षण में कोई प्रक्रियागत त्रुटि नहीं पाई गई, इसलिए अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

फैसले में कोर्ट ने कहा —

“याचिकाकर्ता ने अपने सहकर्मी की पत्नी के साथ अवैध संबंध स्थापित किए, उपहार दिए और बार-बार उसके घर गया — यह कृत्य न केवल नैतिक रूप से आपत्तिजनक है बल्कि उस वर्दी की गरिमा के भी खिलाफ है जिसे वह पहनता है।”

मामला: Patil Shivaji Madhukar बनाम भारत संघ
मामला संख्या: W.P.(C) 1027/2024
पक्षकार: डॉ. सुरेंद्र सिंह हूडा, आयुष्मान ऐरन और शौर्य प्रताप सिंह बंश्टू (याचिकाकर्ता पक्ष के वकील); श्री अंशुमन, वरिष्ठ स्थायी परामर्शदाता (भारत संघ के लिए)।

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