दिल्ली हाईकोर्ट ने 25 साल बाद पूर्व CISF अधिकारी को किया दोषमुक्त, झूठे यौन उत्पीड़न केस को बताया “प्रतिशोध से प्रेरित”, सम्मान बहाल
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक पूर्व अधिकारी को करीब 25 साल बाद बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को झूठा और प्रतिशोध से प्रेरित करार दिया है। अदालत ने वर्ष 2005 में दिए गए अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि इस कार्रवाई ने अधिकारी की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचाया।
19 दिसंबर 2025 को सुनाए गए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य नहीं थे और बार-बार जांच कराना अनुचित था। अदालत ने अधिकारी का सम्मान बहाल करते हुए उनकी पेंशन का पुनर्निर्धारण करने के निर्देश दिए, हालांकि पिछला वेतन (एरियर्स) देने से इनकार किया।
क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता अधिकारी ने 1976 में CISF जॉइन किया था और 1997 में असिस्टेंट कमांडेंट बने। 1999 में एक महिला कांस्टेबल ने उन पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने, अवैध संबंध बनाने की कोशिश और दो अन्य महिलाओं को परेशान करने जैसे आरोप लगाए। अधिकारी ने शुरू से ही आरोपों को सिरे से खारिज किया और कहा कि शिकायत इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने शिकायतकर्ता को ड्यूटी में लापरवाही पर पहले चेतावनी दी थी।
तीन प्रारंभिक जांच और विवाद
मामले में दो प्रारंभिक जांचों में अधिकारी को स्पष्ट रूप से क्लीन चिट मिली। इसके बावजूद वरिष्ठ अधिकारियों ने तीसरी प्रारंभिक जांच का आदेश दिया, जिसमें आरोपों को सही बताया गया। इसी के आधार पर विभागीय कार्रवाई चली और 2005 में अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश पारित हुआ।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विमल कुमार यादव की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब अधिकारी को दो बार निर्दोष पाया जा चुका था, तब तीसरी जांच का कोई औचित्य नहीं था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला वास्तविक उत्पीड़न से अधिक प्रतिशोध की बू देता है।
अदालत ने शिकायत पत्र में तिथियों का अभाव, स्पष्ट विवरणों की कमी, और यह भी कि पत्र किसे संबोधित था—इन सभी गंभीर खामियों की ओर इशारा किया। साथ ही, अन्य महिलाओं से जुड़े आरोप जांच में साबित नहीं हो पाए।
कोर्ट ने कहा:
“शिकायत प्रतिशोध से प्रेरित प्रतीत होती है। संभव है कि याचिकाकर्ता द्वारा की गई कार्रवाई के कारण बढ़ा-चढ़ाकर या झूठी शिकायत दर्ज की गई हो।”
सम्मान बहाली पर जोर
अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि उन्हें मुआवजा नहीं, बल्कि सम्मान की बहाली चाहिए। उनकी उम्र और लंबा समय बीत जाने को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि कम से कम उनके सम्मान को बहाल करना आवश्यक है।
फैसले में कहा गया:
“25 वर्षों के अंतराल और याचिकाकर्ता की 72 वर्ष की आयु को देखते हुए, उनके सम्मान की बहाली ही न्यूनतम न्याय है।”
क्या आदेश दिया गया
- 2005 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश रद्द
- अधिकारी को सुपरएनुएशन तक सेवा में माना जाएगा
- पेंशन का पुनर्निर्धारण होगा
- बैक वेज/एरियर्स नहीं मिलेंगे
- याचिका बिना लागत स्वीकार
केस विवरण
- मामला: Ex. Asstt. Commandant R.S. Yadav बनाम Union of India & अन्य
- केस नंबर: W.P.(C) 6806/2006
- कोर्ट: दिल्ली हाईकोर्ट
- फैसले की तारीख: 19 दिसंबर 2025
- पीठ: जस्टिस दिनेश मेहता, जस्टिस विमल कुमार यादव
- याचिकाकर्ता के वकील: लोकेश भारद्वाज, आशना नारंग, जतिन, शिवम चौहान
- प्रतिवादियों के वकील: आर. डी. भारद्वाज (CGSC), कुशाग्र कुमार (सीनियर पैनल काउंसल)

