CRPF में प्रमोशन का संकट: 17 साल से एक ही पद पर अटके हजारों इंस्पेक्टर, हाईकोर्ट पहुंचा मामला
नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में पदोन्नति का मुद्दा गंभीर प्रशासनिक और कानूनी विवाद का रूप लेता जा रहा है। ग्रुप ‘ए’ और ग्रुप ‘बी’ कैडर अधिकारियों की पदोन्नति लंबे समय से लंबित है, जिसके चलते हजारों अधिकारी करियर ठहराव का सामना कर रहे हैं। मामला अब अदालत से निकलकर संसद तक पहुंच चुका है।
संसद और अदालत तक पहुंचा मामला
सीआरपीएफ में पदोन्नति विवाद पहले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है और अब इसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) बिल, 2026 के रूप में संसद में भी उठाया गया है। दूसरी ओर, पदोन्नति में देरी से परेशान ग्रुप ‘बी’ कैडर के इंस्पेक्टरों ने न्यायिक लड़ाई शुरू कर दी है।
करीब 6000 इंस्पेक्टर सहायक कमांडेंट (एसी) बनने की प्रतीक्षा में हैं। मौजूदा पदोन्नति दर को देखते हुए अनुमान है कि सभी अधिकारियों को पदोन्नति मिलने में 200 साल से अधिक समय लग सकता है।
22 हजार कर्मियों की पदोन्नति पर सवाल
सीआरपीएफ में एसी पद के लिए फीडर कैडर सब-इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर हैं। वर्तमान में बल में लगभग 6000 इंस्पेक्टर और 16000 एसआई कार्यरत हैं। पहले एक कंपनी में एक एसी और एक इंस्पेक्टर होता था, जिससे पदोन्नति का संतुलन बना रहता था।
लेकिन 2019 के कैडर रिव्यू के बाद एक कंपनी में इंस्पेक्टरों की संख्या तीन कर दी गई, जबकि एसी का पद एक ही रखा गया। इसका सीधा असर पदोन्नति पर पड़ा। जहां पहले इंस्पेक्टर से एसी बनने में लगभग पांच वर्ष लगते थे, अब यह अवधि बढ़कर 17 वर्ष से भी अधिक हो गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई
पदोन्नति में ठहराव के खिलाफ सीआरपीएफ इंस्पेक्टरों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल की पीठ ने मामले में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 28 अप्रैल को तय की गई है।
भर्ती नियम 2010 को चुनौती
याचिका में ग्रुप ‘ए’ अधिकारी भर्ती नियम, 2010 को चुनौती दी गई है। विशेष रूप से सहायक कमांडेंट पद पर 50 प्रतिशत सीधी भर्ती के प्रावधान पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यूपीएससी के माध्यम से बड़ी संख्या में सीधी भर्ती होने से विभागीय पदोन्नति लगभग समाप्त हो गई है।
उनका आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया निर्धारित सीमा से अधिक हो रही है और यह कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन है।
17 वर्षों से एक ही पद पर अधिकारी
कई अधिकारी वर्ष 2005 में सब-इंस्पेक्टर भर्ती हुए और 2009 में इंस्पेक्टर बने, लेकिन पिछले 16–17 वर्षों से उसी पद पर कार्यरत हैं। आतंकवाद विरोधी अभियान, नक्सल ऑपरेशन और कानून-व्यवस्था ड्यूटी में अग्रिम पंक्ति में तैनाती के बावजूद उन्हें करियर उन्नति का अवसर नहीं मिल पा रहा।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 2026 के प्रस्तावित कैडर रिव्यू में सहायक कमांडेंट पदों में कटौती की संभावना सामने आई और 100 से अधिक पदों पर सीधी भर्ती की अधिसूचना जारी हुई।
अन्य केंद्रीय बलों में भी समस्या
पदोन्नति ठहराव केवल सीआरपीएफ तक सीमित नहीं है। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) सहित अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भी एसआई और इंस्पेक्टर लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं। इससे अधिकारियों में मानसिक तनाव, पेशेवर असंतोष और मनोबल में गिरावट देखी जा रही है।
समाधान के लिए सुझाए गए उपाय
याचिकाकर्ताओं ने समस्या के समाधान हेतु कई सुझाव दिए हैं—
- सीधी भर्ती और विभागीय पदोन्नति में संतुलन
- सहायक कमांडेंट के अतिरिक्त पद सृजित करना
- बैकलॉग रिक्तियों को प्रमोशन से भरना
- लंबे समय से सेवा दे रहे निरीक्षकों को प्राथमिकता
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद हजारों कर्मियों में उम्मीद जगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला न केवल सीआरपीएफ बल्कि सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की भविष्य की भर्ती और पदोन्नति नीति को प्रभावित कर सकता है।
(SOURCE – AMAR UJALA)

