CRPF कैडर अधिकारियों की पदोन्नति पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश बेअसर, 15 साल बाद भी पहली प्रमोशन नहीं
नई दिल्ली।
देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) सीआरपीएफ में ग्राउंड कमांडर कहे जाने वाले सहायक कमांडेंट वर्षों से पदोन्नति के इंतजार में हैं। हालात यह हैं कि 2008 के बाद यूपीएससी से सीधी भर्ती होकर आए कैडर अधिकारी 15–15 साल में भी पहली पदोन्नति नहीं पा सके हैं। सुप्रीम कोर्ट से कानूनी लड़ाई जीतने के बावजूद अब तक उन्हें न पदोन्नति मिली है और न ही वित्तीय लाभ।
सीआरपीएफ मुख्यालय की बैठक में उठा मुद्दा
हाल ही में सीआरपीएफ मुख्यालय में आयोजित एक बैठक में एडीजी साउथ जोन ने यह मुद्दा उठाया कि कैडर अधिकारियों की पदोन्नति से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में तय हो चुका है और अब महानिदेशालय (DG) को आदेश जारी करने चाहिए।
इस पर सीआरपीएफ डीजी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद बल के नियम गृह मंत्रालय और डीओपीटी के निर्देशों के अनुसार लागू होते हैं। जैसे ही गृह मंत्रालय/डीओपीटी से आदेश प्राप्त होंगे, आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
सुप्रीम जीत के बाद भी नहीं मिले फायदे
सीआरपीएफ ही नहीं, बल्कि आईटीबीपी, बीएसएफ, सीआईएसएफ और एसएसबी जैसे सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैडर अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से जीत मिलने के बावजूद नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (NFFU), कैडर रिव्यू और पदोन्नति का लाभ नहीं मिला।
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर कैडर रिव्यू करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। यह समीक्षा मूल रूप से 2021 में होनी थी, लेकिन आज तक लंबित है।
अवमानना याचिका तक पहुंचा मामला
न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने डीओपीटी को निर्देश दिया था कि गृह मंत्रालय से कार्रवाई रिपोर्ट मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के छह महीने बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिसके चलते सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों ने 6 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी।
23 मई 2025 का ऐतिहासिक फैसला
23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कई याचिकाओं पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि
- सीएपीएफ की भूमिका देश की सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है
- आईपीएस प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए
- संगठित समूह ‘ए’ सेवा (OGAS) को पूरी तरह लागू किया जाए
- कैडर रिव्यू और सेवा नियमों में संशोधन छह महीने में पूरा किया जाए
हालांकि इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार रिव्यू पिटीशन में चली गई, जिसे 28 अक्टूबर 2025 को जस्टिस सूर्य कांत (अब मुख्य न्यायाधीश) और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने खारिज कर दिया।
फैसले के उलट बढ़ी आईपीएस प्रतिनियुक्ति
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत, पिछले छह महीनों में सीएपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और तेज हो गई।
विशेष रूप से डीआईजी रैंक पर आईपीएस अधिकारियों की तैनाती का ग्राफ लगातार ऊपर गया, जिससे कैडर अधिकारियों की पदोन्नति और नेतृत्व के अवसर और सीमित हो गए।
सुनवाई में क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
27 फरवरी को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति अभय एस. ओका ने स्पष्ट कहा था कि
“सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) में तो प्रतिनियुक्ति पूरी तरह बंद होनी चाहिए।”
सुनवाई में यह भी सामने आया कि जहां केंद्र की अन्य ग्रुप-ए सेवाओं में 19–20 साल में SAG मिल जाता है, वहीं सीएपीएफ में अधिकारियों को 36 साल तक इंतजार करना पड़ रहा है।
आईपीएस प्रतिनियुक्ति से कैडर अधिकारी पिछड़े
सुप्रीम कोर्ट में यह तथ्य भी रखा गया कि आईपीएस अधिकारियों की वजह से सीएपीएफ कैडर अधिकारी नेतृत्व के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।
सीआरपीएफ के पूर्व एसी और अधिवक्ता सर्वेश त्रिपाठी के अनुसार,
“सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करना ही नहीं चाहती, इसलिए मजबूरी में अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी।”
2016 से नहीं हुआ कैडर रिव्यू
बीएसएफ और सीआरपीएफ में 2016 के बाद से कोई कैडर रिव्यू नहीं हुआ, जबकि डीओपीटी का नियम है कि हर पांच साल में कैडर रिव्यू अनिवार्य है।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एस.के. सूद कहते हैं कि दस लाख से ज्यादा बलकर्मियों में केवल करीब 20 हजार कैडर अधिकारी हैं, लेकिन इनके लिए पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं।
इतिहास गवाह, फिर भी उपेक्षा
कैडर अधिकारियों के नेतृत्व में सीएपीएफ ने दशकों तक देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई है। सैकड़ों अधिकारियों ने सर्वोच्च बलिदान दिए, इसके बावजूद आज भी इन बलों का नेतृत्व बाहरी प्रतिनियुक्ति पर निर्भर है।
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि 1955 के फोर्स एक्ट में आईपीएस आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। 1968–70 के दौर में खुद तत्कालीन डीजी और गृह सचिवों ने सलाह दी थी कि आईपीएस के लिए पद आरक्षित न किए जाएं, लेकिन यह सलाह कभी लागू नहीं हुई।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट और दोहराए गए आदेशों के बावजूद कैडर अधिकारियों को न पदोन्नति मिली, न वित्तीय लाभ।
अब सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार अदालत के फैसलों का सम्मान करते हुए कैडर अधिकारियों को उनका हक देगी, या फिर यह मामला आगे और संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ेगा?

