CRPF के असिस्टेंट कमांडेंट सागर बोराडे: देश सेवा में खोया पैर, लेकिन हौसला अब भी अटूट
नई दिल्ली: देश की सेवा में अपनी जान की परवाह न करने वाले बहादुर जवानों और अधिकारियों की कहानियां हमें हमेशा प्रेरित करती हैं। ऐसी ही एक कहानी है CRPF के असिस्टेंट कमांडेंट सागर बोराडे की, जिन्होंने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में अपने एक जवान की जान बचाने के लिए अपना बायां पैर गंवा दिया। आईआईटी से पढ़े सागर की उम्र अभी सिर्फ 32 साल है, लेकिन उनका जज्बा और समर्पण किसी अनुभवी योद्धा से कम नहीं है।
यह घटना मई महीने की है, जब छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा पर स्थित केजीएच हिल्स में एक हाई-रिस्क एंटी-नक्सल ऑपरेशन चल रहा था। सागर सीआरपीएफ की 204 कोबरा बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे। अचानक एक आईईडी ब्लास्ट में उनकी बटालियन का एक जवान घायल हो गया। सागर ने बिना एक पल सोचे उस जवान को बचाने के लिए छलांग लगा दी। इस दौरान उन्हें गंभीर चोटें आईं और उनका बायां पैर का एंकल वाला हिस्सा हमेशा के लिए खो गया।
घटना के बाद सागर को दिल्ली के एम्स अस्पताल में भेजा गया, जहां उनका इलाज चला। अब वे स्वस्थ और स्थिर हैं। हाल ही में उन्होंने वापस ड्यूटी जॉइन की है, लेकिन अब वे जीवन भर प्रोस्थेटिक पैर के साथ डेस्क जॉब करेंगे। सागर शादीशुदा हैं और उनके सामने अभी पूरा जीवन पड़ा है, लेकिन उन्होंने कभी अपनी चिंता नहीं की—बस देश और अपनी टीम के बारे में सोचा।
सोशल मीडिया पर उनकी कहानी वायरल हो रही है, जहां लोग उन्हें असली हीरो बता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “सागर जैसे निर्भीक टीम लीडर्स जब हर क्षेत्र में होंगे, तो हम कभी नहीं हारेंगे।” यह कहानी हमें याद दिलाती है कि फिल्मी हीरोज से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वे जवान और अधिकारी जो चुपचाप देश की रक्षा करते हैं।सागर की बहादुरी से प्रेरित होकर कई लोग सवाल उठा रहे हैं—कब हम ऐसे रीयल हीरोज को सही सम्मान देंगे? कब उनकी कहानियां मुख्यधारा में आएंगी? सीआरपीएफ जैसे बलों में ऐसे कई योद्धा हैं जो गुमनाम रहकर अपना फर्ज निभाते हैं। सागर बोराडे की कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि देश सेवा का असली मतलब क्या है।

