नैनीताल हाईकोर्ट से CISF जवान को बड़ी राहत, भरण-पोषण का एकपक्षीय आदेश और वसूली वारंट रद्द
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तमिलनाडु में तैनात CISF के एक जवान के खिलाफ पारिवारिक न्यायालय द्वारा जारी भरण-पोषण के एकपक्षीय आदेश और वसूली वारंट को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने कहा कि न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप प्रत्येक पक्ष को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना जरूरी है, विशेषकर तब जब मामला भरण-पोषण जैसे संवेदनशील मुद्दे से जुड़ा हो।
क्या है मामला?
साल 2023 में एक महिला ने अपने पति—जो उस समय तमिलनाडु में CISF में कांस्टेबल के रूप में तैनात थे—के खिलाफ धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का वाद दायर किया था। जवान ने हाईकोर्ट को बताया कि 5 अक्टूबर 2023 को पारिवारिक न्यायालय में होने वाली सुनवाई के लिए उनकी अवकाश अनुमति विभागीय कारणों से स्वीकृत नहीं हो सकी।
उनकी अनुपस्थिति में पारिवारिक न्यायालय ने 10 नवंबर 2023 को एकपक्षीय आदेश पारित करते हुए पत्नी को 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने और 75,000 रुपये की वसूली का निर्देश जारी कर दिया।
जवान ने इसके बाद धारा 126(2) CrPC के तहत आदेश वापस लेने का आवेदन किया, जिसे भी निचली अदालत ने खारिज कर दिया। यह निर्णय उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में क्या कहा गया?
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि
- जवान जानबूझकर अदालत में उपस्थित नहीं हो सके, ऐसा नहीं था,
- उनकी पोस्टिंग दूरदराज राज्य में थी,
- छुट्टी मिलने में बाधा थी,
- इसलिए उनकी अनुपस्थिति को जल्दबाजी में “इच्छाकृत गैर-हाजिरी” मानना गलत है।
हाईकोर्ट ने भी माना कि पारिवारिक न्यायालय ने जवान की परिस्थितियों—विशेषकर राज्य से बाहर तैनाती और सरकारी सेवा की बाध्यताओं—का पर्याप्त संज्ञान नहीं लिया। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि एकपक्षीय आदेश की जानकारी मिलते ही जवान ने तत्काल कानूनी उपाय किए, जो उनकी सद्भावना को दर्शाता है।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनः पारिवारिक न्यायालय, विकासनगर भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि—
- दोनों पक्षों को सुनकर गुण-दोष के आधार पर नया निर्णय दिया जाए।
- चूंकि जवान राज्य से बाहर तैनात है, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने की अनुमति दी जाए।
कानूनी प्रक्रिया में सुरक्षा बल कर्मियों की परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
अदालत ने कहा कि भरण-पोषण मामलों की प्रकृति भले ही संक्षिप्त हो, परंतु किसी भी सरकारी/अर्धसैनिक बल कर्मी की सेवा-स्थितियों को नजरअंदाज कर निर्णय देना न्याय के विरुद्ध है। ऐसे कर्मियों के लिए व्यावहारिक और न्यायसंगत प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है।

