ड्यूटी पर मोबाइल इस्तेमाल के मामले में CISF कॉन्स्टेबल को राहत, कलकत्ता हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द की
कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF) के एक कॉन्स्टेबल को बड़ी राहत देते हुए उसकी सेवा से बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि ड्यूटी के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना गलत है और इसे माफ नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसी गलती के लिए करियर खत्म कर देना न्यायसंगत नहीं है।
जस्टिस अनन्या बंद्योपाध्याय ने 6 फरवरी को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, परंतु सजा ऐसी होनी चाहिए जो सुधारात्मक हो, न कि जीवनभर की सजा बन जाए। कोर्ट ने टिप्पणी की, “गलत काम को माफ नहीं किया जा सकता। उसमें सुधार होना चाहिए, लेकिन करियर बर्बाद करने की कीमत पर नहीं।”
क्या था मामला?
मामला अगस्त और सितंबर 2013 की दो घटनाओं से जुड़ा है। आरोप था कि संबंधित CISF कॉन्स्टेबल ने नाइट शिफ्ट और अतिरिक्त ड्यूटी शिफ्ट के दौरान मोबाइल फोन पर बातचीत की। जब वरिष्ठ अधिकारियों ने उससे डिवाइस मांगा तो उसने पहले देने से इनकार कर दिया। हालांकि बाद में उसने कंपनी कमांडेंट को दो मोबाइल फोन और तीन सिम कार्ड सौंप दिए।
इस मामले में विभागीय जांच CISF रूल्स, 2001 के रूल 36 के तहत की गई। जांच के बाद जनवरी 2014 में उसे सेवा से हटा दिया गया। अपीलीय प्राधिकारी ने 2014 में और पुनरीक्षण प्राधिकारी ने 2015 में इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद कॉन्स्टेबल ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पिछला रिकॉर्ड भी बना आधार
अधिकारियों ने कॉन्स्टेबल के पूर्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि उसके खिलाफ पहले भी पांच छोटी सजाएं दी जा चुकी थीं। इनमें ड्यूटी से अनुपस्थित रहना, एक आम नागरिक से झगड़ा करना और ड्यूटी क्षेत्र में चोरी की घटना जैसी लापरवाहियां शामिल थीं। विभाग का तर्क था कि वह लगातार अनुशासन की अनदेखी कर रहा था और यूनिफॉर्म फोर्स में बने रहने योग्य नहीं है।
कोर्ट की सख्त लेकिन संतुलित टिप्पणी
हाई कोर्ट ने माना कि सुरक्षा बलों में अनुशासन अत्यंत महत्वपूर्ण है और CISF को हर समय सतर्क रहना चाहिए। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि इस विशेष मामले में मोबाइल इस्तेमाल से कोई ठोस या प्रत्यक्ष नुकसान सामने नहीं आया। कोर्ट ने कहा कि “सर्विस डिसिप्लिन के नाजुक मामलों में फेयरनेस दुश्मन नहीं, बल्कि साथी होनी चाहिए।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार करना और संवैधानिक संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सोहिनी सामंत ने दलील दी कि कार्रवाई दुर्भावना और भेदभाव से प्रेरित थी। उन्होंने कहा कि हटाने की सजा कथित गलती के अनुपात में अत्यधिक कठोर थी और जांच प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
वहीं, यूनियन ऑफ इंडिया की ओर से अधिवक्ता स्वप्न कुमार नंदी और बनानी भट्टाचार्य ने याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर सवाल उठाते हुए सीपीसी की धारा 80 के तहत नोटिस की कमी और देरी का मुद्दा उठाया।
गलत काम को सुधारा जाए, करियर खत्म न करें” जस्टिस अनन्या बंद्योपाध्याय ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यद्यपि गलत काम को माफ नहीं किया जा सकता, लेकिन सजा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। कोर्ट ने 6 फरवरी को दिए अपने आदेश में टिप्पणी की:
“गलत काम में सुधार होना चाहिए, लेकिन करियर बर्बाद करने की कीमत पर नहीं। सर्विस डिसिप्लिन के नाजुक मामले में, निष्पक्षता (Fairness) को दुश्मन नहीं, बल्कि साथी होना चाहिए। सजा ऐसी हो जो सिर्फ दंड न दे, बल्कि उसमें सुधार और संतुलन हो।”
अदालत ने यह भी माना कि ड्यूटी पर मोबाइल का इस्तेमाल अनुशासनहीनता है और सुरक्षा बलों को अलर्ट रहने की जरूरत है, लेकिन इस कृत्य से विभाग को कोई ‘ठोस नुकसान’ नहीं हुआ था, इसलिए नौकरी से निकालने जैसा कदम उठाना सही नहीं था।

