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केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए ‘अर्धसैनिक झंडा दिवस कोष’ की मांग, अब तक नहीं हो सका गठन

नई दिल्ली।
सेना में वर्षों से संचालित ‘सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष’ की तर्ज पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) के लिए अलग ‘अर्धसैनिक झंडा दिवस कोष’ का गठन अब तक नहीं हो सका है। इसको लेकर लंबे समय से मांग उठती रही है, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से अब तक कोई अंतिम निर्णय या औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है।

पूरे देश में 7 दिसंबर को ‘सशस्त्र सेना झंडा दिवस’ मनाया जाता है। इसी क्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों के तहत हाल ही में सीआरपीएफ के अधिकारियों और जवानों से स्वेच्छा से इस कोष में योगदान करने की अपील की गई थी। इसके लिए यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों से दान करने की सुविधा भी दी गई और डिजिटल टोकन फ्लैग डाउनलोड करने का विकल्प उपलब्ध कराया गया।

हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि जब सेना के कल्याण के लिए अलग कोष मौजूद है, तो देश की आंतरिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए अब तक ऐसा कोई समर्पित कोष क्यों नहीं बनाया गया।

2021 में हुई थी अहम बैठक

अर्धसैनिक बलों के कल्याण, पुनर्वास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झंडा दिवस कोष की स्थापना को लेकर 2 फरवरी 2021 को तत्कालीन गृह सचिव के साथ एक अहम बैठक हुई थी। उस समय इस विषय पर किसी निश्चित तिथि पर आगे की प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन भी दिया गया था, लेकिन इसके बाद फाइल आगे नहीं बढ़ सकी।

देश की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को देश की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है। ये बल सीमाओं की निगरानी से लेकर संसद, हवाई अड्डों, महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों और वीवीआईपी सुरक्षा तक जिम्मेदारी निभाते हैं। इसके अलावा बाढ़, भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, शांतिपूर्ण व निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना, कश्मीर में आतंकवाद और विभिन्न राज्यों में नक्सलवाद से मुकाबला जैसे चुनौतीपूर्ण कार्य भी इन्हीं बलों के जिम्मे हैं।

सेना को मिला लाभ, अर्धसैनिक पीछे

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष से मिलने वाली आर्थिक सहायता राशि में दोगुनी वृद्धि की घोषणा की। इस फैसले से गैर-पेंशनधारी पूर्व सैनिकों, विधवाओं और उनके आश्रितों को बड़ा लाभ मिला है। सरकार पर इससे लगभग 257 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आएगा और संशोधित दरें 1 नवंबर 2025 से लागू होंगी।

इसके विपरीत, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए अभी तक ऐसा कोई कोष अस्तित्व में नहीं है, जिससे शहीदों के परिवारों, दिव्यांग जवानों, गैर-पेंशनभोगियों और पूर्व अर्धसैनिक कर्मियों को नियमित आर्थिक सहायता मिल सके।

शहीदों और पीड़ित परिवारों का सवाल

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बीएसएफ द्वारा पाकिस्तान के 118 बंकर ध्वस्त किए जाने और नक्सलवाद के खिलाफ दशकों से चले अभियानों में सीआरपीएफ व अन्य बलों के सैकड़ों जवानों की शहादत के बावजूद, उनके परिवारों के लिए अलग कल्याण कोष न होना लगातार सवाल खड़े करता है।

इसके अलावा 1996-97 में विभागीय कारणों से बीएसएफ रूल 19 के तहत 10 साल की सेवा के बाद घर भेजे गए सैकड़ों जवानों का मुद्दा भी आज तक अनसुलझा है। इन जवानों को न्यूनतम पेंशन का भरोसा दिया गया था, जो कुछ समय बाद बंद कर दी गई। कई जवान इसी उम्मीद में दुनिया से चले गए और उनके परिवार आज भी सहायता की प्रतीक्षा में हैं।

फिर उठी कोष गठन की मांग

केंद्रीय गृह मंत्रालय के समक्ष एक बार फिर यह मांग रखी गई है कि पूर्व अर्धसैनिक कर्मियों, उनकी विधवाओं, गैर-पेंशनभोगियों, ऑपरेशन के दौरान दिव्यांग हुए जवानों और उनकी बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह तथा पुनर्वास के लिए ‘अर्धसैनिक झंडा दिवस कोष’ का शीघ्र गठन किया जाए।
यह भी तर्क दिया जा रहा है कि इसके लिए किसी अतिरिक्त बजटीय प्रावधान की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि आम नागरिक स्वेच्छा से इस कोष में योगदान देने को तैयार हैं।

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