CAPF में अदालती जीत के बाद भी इंस्पेक्टरों को नहीं मिला हक, बीएसएफ के 129 इंस्पेक्टरों का 5400 ग्रेड पे का सपना टूटा
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) में तैनात जवानों और अधिकारियों के लिए यह कोई नई बात नहीं है कि वे अपनी पदोन्नति, भत्तों और आर्थिक अधिकारों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में अदालत से जीत मिलने के बावजूद भी उन्हें वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। चाहे संगठित सेवा का दर्जा देने का मामला हो, गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (NFFU) या पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली हो, या फिर 4800 ग्रेड पे में चार साल की सेवा पूरी करने के बाद 5400 ग्रेड पे देने का विषय—लगभग हर केस में अदालती आदेश के बाद कोई न कोई अड़चन खड़ी हो जाती है।
अब ऐसा ही मामला सीमा सुरक्षा बल (BSF) के 129 इंस्पेक्टरों के साथ सामने आया है, जिनका 5400 रुपये ग्रेड पे पाने का सपना एक बार फिर टूट गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद आया स्पीकिंग ऑर्डर
बीएसएफ मुख्यालय में आईजी (पर्सनल) की ओर से हाल ही में एक स्पीकिंग ऑर्डर जारी किया गया है। यह आदेश बीएसएफ इंस्पेक्टर आनंद प्रताप सिंह और 128 अन्य की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश के बाद आया। इन इंस्पेक्टरों ने अदालत में दलील दी थी कि वे 4800 रुपये ग्रेड पे में चार साल से अधिक की सेवा पूरी कर चुके हैं, ऐसे में वित्त मंत्रालय के 29 अगस्त 2008 के कार्यालय ज्ञापन (OM) के अनुसार उन्हें 5400 रुपये ग्रेड पे दिया जाना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 फरवरी 2025 को रिट पिटीशन संख्या 1743/2025 का निपटारा करते हुए बीएसएफ को निर्देश दिया था कि याचिका को प्रतिवेदन मानकर आठ सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाए। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि यदि आईटीबीपी इंस्पेक्टर सुशील कुमार के केस की तरह सभी मापदंड पूरे होते हैं, तो बीएसएफ इंस्पेक्टरों को भी वही लाभ दिया जाए।
आठ हफ्ते की जगह 11 महीने बाद फैसला
अदालत ने जहां आठ सप्ताह का समय दिया था, वहीं बीएसएफ ने लगभग 11 महीने बाद, 6 जनवरी 2026 को आदेश जारी किया। इस आदेश में बीएसएफ ने कई ऐसे तर्क दिए, जिनसे इंस्पेक्टर हैरान रह गए। आदेश में कहा गया कि वित्त मंत्रालय का 2008 का OM कुछ सीमित सेवाओं पर लागू होता है और बीएसएफ के जीडी कैडर के इंस्पेक्टर इसके दायरे में नहीं आते। बीएसएफ का तर्क है कि यह मामला ग्रुप ‘बी’ से जुड़ा है, जबकि NFFU मुख्य रूप से ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के लिए है।
आईटीबीपी केस का हवाला, फिर भी लाभ से इनकार
बीएसएफ ने यह भी कहा कि आईटीबीपी इंस्पेक्टर सुशील कुमार का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन के तहत लंबित है, इसलिए बीएसएफ इंस्पेक्टरों को मेरिट के आधार पर 5400 ग्रेड पे नहीं दिया जा सकता। जबकि तथ्य यह है कि सुशील कुमार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 17 अप्रैल 2025 को सरकार की एसएलपी खारिज कर दी थी, जिससे दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला अंतिम हो गया था।
आईटीबीपी के इंस्पेक्टर सुशील कुमार (फार्मासिस्ट) को अदालत ने वित्त मंत्रालय के 2008 के OM के आधार पर 4800 से 5400 ग्रेड पे देने का आदेश दिया था। इसके बाद बीएसएफ और सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों ने भी समान लाभ की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया।
वित्त मंत्रालय का 2008 का OM और उसका इतिहास
29 अगस्त 2008 को वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट कहा गया था कि जिन कर्मियों का ग्रेड पे 4800 रुपये है और जिन्होंने उसमें चार साल की सेवा पूरी कर ली है, उनका ग्रेड पे 5400 रुपये किया जाएगा। यह लाभ पाने के लिए कई विभागों के कर्मचारियों को अदालत जाना पड़ा।
सीबीडीटी के इंस्पेक्टर एम. सुब्रमण्यम के मामले में मद्रास हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक यह मुद्दा पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने अंततः सरकार की सभी अपीलें और रिव्यू पिटीशन खारिज कर दीं। इसके बाद केंद्र सरकार ने ग्रुप ‘बी’ सिविल कर्मियों को यह लाभ देना स्वीकार किया, लेकिन केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को इससे बाहर रखा गया।
भेदभाव का आरोप
जानकारों का कहना है कि एक ही वेतनमान और एक ही वित्त मंत्रालय के आदेश के बावजूद सिविल विभागों के ग्रुप ‘बी’ कर्मियों को जहां 5400 ग्रेड पे का लाभ मिला, वहीं सीएपीएफ के इंस्पेक्टरों को इससे वंचित रखा गया। बीएसएफ का यह तर्क कि जीडी कैडर में पदोन्नति के अवसर अधिक हैं, इसलिए NFFU की जरूरत नहीं है, कई सवाल खड़े करता है, क्योंकि वास्तविकता में इंस्पेक्टर से सहायक कमांडेंट बनने में अक्सर 12–15 साल लग जाते हैं।
आगे क्या?
बीएसएफ के 129 इंस्पेक्टरों को स्पीकिंग ऑर्डर के जरिए फिलहाल राहत नहीं मिली है। अब संभावना है कि वे इस आदेश को चुनौती देते हुए एक बार फिर अदालत का रुख करें। यह मामला न केवल बीएसएफ, बल्कि पूरे सीएपीएफ के हजारों इंस्पेक्टरों और अधिकारियों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जो वर्षों से समान वेतन और आर्थिक न्याय की मांग कर रहे हैं।
(SOURCE – AMAR UJALA)

