BSF पैरामिलिट्री नहीं, भारत संघ की सशस्त्र सेना है: पूर्व प्रवक्ता कृष्णा राव का दावा, जानिए कानूनी तथ्य
नई दिल्ली, 24 दिसंबर 2025: सीमा सुरक्षा बल (BSF) को अक्सर पैरामिलिट्री फोर्स के रूप में देखा जाता है, लेकिन क्या यह धारणा सही है? बीएसएफ के पूर्व प्रवक्ता और सेवानिवृत्त अधिकारी कृष्णा राव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर इस मिथक को चुनौती दी है। उन्होंने संविधान, संसदीय कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं का हवाला देकर दावा किया है कि बीएसएफ वास्तव में भारत संघ की सशस्त्र सेना है, न कि कोई सहायक या पुलिस बल।
राव की पोस्ट, जो आज सुबह पोस्ट की गई, में उन्होंने कहा कि मीडिया, जनता और यहां तक कि रणनीतिक समुदाय में बीएसएफ को पैरामिलिट्री कहने की प्रवृत्ति गलत है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 33 का जिक्र किया, जो सशस्त्र सेनाओं के सदस्यों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने की संसद की शक्ति की बात करता है। राव के अनुसार, बीएसएफ इस श्रेणी में आता है, जहां मौलिक अधिकारों पर सख्त प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जो केवल सशस्त्र सेनाओं के लिए संभव है।
पोस्ट में 1968 के बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स एक्ट का उल्लेख करते हुए राव ने कहा कि इस कानून में स्पष्ट रूप से बीएसएफ को “संघ की सशस्त्र सेना” कहा गया है। उन्होंने तर्क दिया कि संसद ने जानबूझकर इस शब्द का इस्तेमाल किया, न कि “सशस्त्र पुलिस” या “पैरामिलिट्री फोर्स”। एक्ट की संरचना भी सेना के कानूनों से मिलती-जुलती है, जैसे कमांड स्ट्रक्चर, कोर्ट ऑफ इंक्वायरी और सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट, जो कोर्ट मार्शल के समान हैं।
राव ने बीएसएफ की ऑपरेशनल भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि यह बल 1965, 1971 के युद्धों, कारगिल संघर्ष और वर्तमान प्रॉक्सी वॉर में सक्रिय रहा है। उन्होंने कहा, “बीएसएफ युद्ध में सशस्त्र सेना नहीं बनता, यह पहले से ही है।” उनका मानना है कि गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के कारण इसे पैरामिलिट्री मानना गलत है, क्योंकि इसका चरित्र और मिशन सैन्य है।
न्यायिक पहलू पर राव ने कहा कि भारतीय अदालतें बीएसएफ को सशस्त्र सेना के रूप में मान्यता देती रही हैं और इसके सदस्यों पर अनुच्छेद 33 के तहत प्रतिबंधों को बरकरार रखा है। उन्होंने “पैरामिलिट्री” शब्द को ब्रिटिश काल की विरासत बताया, जिसका भारतीय संविधान में कोई स्थान नहीं है।
इस मिथक के परिणामों पर चिंता जताते हुए राव ने कहा कि इससे संस्थागत सम्मान प्रभावित होता है, वेतन, रैंक समकक्षता और कमांड नियुक्तियों में भेदभाव होता है। इससे मनोबल गिरता है और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता है। उन्होंने कहा, “एक राष्ट्र जो अपने सीमा रक्षकों से सैनिकों की तरह लड़ने की उम्मीद करता है, लेकिन उन्हें सहायक की तरह व्यवहार करता है, वह संस्थागत क्षय के बीज बो रहा है।”
पोस्ट में राव ने संदर्भ के रूप में बीएसएफ एक्ट 1968 की गजट अधिसूचना की छवियां साझा की हैं, जो 2 सितंबर 1968 की हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये विचार उनके व्यक्तिगत हैं, जो बीएसएफ में ऑपरेशनल इकाइयों के कमांड और बॉर्डर मैनेजमेंट के अनुभव पर आधारित हैं।
यह पोस्ट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन रही है, जहां कई उपयोगकर्ता बीएसएफ की स्थिति पर बहस कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्दा सिविल-मिलिट्री संबंधों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की भूमिका पर नए सिरे से विचार करने का अवसर प्रदान करता है। बीएसएफ, जो भारत की सीमाओं की सुरक्षा करता है, वर्तमान में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर में सक्रिय है, जहां यह आतंकवाद और घुसपैठ से निपटता है।
राव की इस अपील से क्या नीतिगत बदलाव आएंगे, यह देखना बाकी है, लेकिन यह निश्चित रूप से बीएसएफ के सम्मान और पहचान के मुद्दे को मुख्यधारा में ला रही है। #जयहिंद


Then what u will tell about ITBP, whose Act &Rule had been passed and Validated by Parliament.,
So, in my view it is not differ fm other CAPFs… Except Role & Duties.
Yes BSF is a Armed Force not is Paramilitary
MHA are declared BSF as CAPF and BSF is not a Police Force – this is the armed forces