एक ही गलती पर दो बार सजा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने CISF जवान को दी राहत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक कांस्टेबल को बड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि एक ही कदाचार के लिए किसी भी कर्मचारी को एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जिस आरोप पर पहले ही मामूली सजा दी जा चुकी हो, उसी आधार पर बाद में बड़ी सजा देना कानूनन गलत है।
यह फैसला न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने प्रभु नाथ यादव बनाम भारत संघ मामले में सुनाया।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता प्रभु नाथ यादव की नियुक्ति CISF में वर्ष 1987 में कांस्टेबल के पद पर हुई थी। सेवा के दौरान उन्हें एक कदाचार के मामले में दो वार्षिक वेतनवृद्धियां रोकने की मामूली सजा दी गई थी। इसके अलावा सात दिन के वेतन की कटौती भी की गई थी।
हालांकि, वर्ष 1991 में जब याचिकाकर्ता को एफिशिएंसी बार (Efficiency Bar) पार कर अगली वेतनवृद्धि मिलनी थी, तब एफिशिएंसी बोर्ड ने उन्हें “नॉट येट फिट” (अभी उपयुक्त नहीं) घोषित कर यह लाभ नहीं दिया। इसका कारण उनके कथित खराब सेवा रिकॉर्ड को बताया गया।
बाद में वर्ष 1994 में याचिकाकर्ता को ‘फिट’ घोषित कर दिया गया और उन्हें वेतनवृद्धि का लाभ भी मिला, लेकिन तीन वर्षों तक रोके जाने के कारण उनका वेतन समान पद व सेवा वाले अन्य कर्मचारियों से कम रह गया। इसका असर उनकी पेंशन पर भी पड़ा।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि:
“किसी व्यक्ति को एक ही कदाचार के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता पहले ही दो वार्षिक वेतनवृद्धियां रोके जाने और वेतन कटौती की सजा भुगत चुका था। ऐसे में उसी आधार पर एफिशिएंसी बार पार न करने देना, वास्तव में एक बड़ी सजा के समान है, जिसका प्रभाव आज भी उसकी पेंशन पर पड़ रहा है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफिशिएंसी बार तभी रोकी जा सकती है जब कर्मचारी की कार्यक्षमता (Efficiency) वास्तव में खराब हो। केवल पुराने मामूली दंड, जिन पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी हो, उन्हें आधार नहीं बनाया जा सकता।
बोर्ड की कार्यवाही पर सवाल
कोर्ट ने माना कि एफिशिएंसी बोर्ड ने जिन दो मामूली सजाओं का हवाला दिया, वे 1988 और 1989 की थीं और उन पर पहले ही दंड दिया जा चुका था। ऐसे में 1991, 1992 और 1993 में एफिशिएंसी बार रोकने का कोई वैध आधार नहीं था।
कोर्ट का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि:
- याचिकाकर्ता का वेतन व अन्य सेवा लाभ पुनः गणना किए जाएं
- सभी बकाया (arrears) का भुगतान किया जाए
- पेंशन सहित अन्य लाभों में हुई कमी को भी ठीक किया जाए
क्यों है यह फैसला अहम
यह निर्णय न केवल CISF बल्कि सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर दोहरी सजा देना संविधान और सेवा कानूनों के खिलाफ है।
मामले का शीर्षक:
प्रभु नाथ यादव बनाम भारत संघ
Writ-A No. 1020 of 2006

