दिल्ली हाई कोर्ट : दिवंगत CRPF जवान की पत्नी को दूसरी शादी पर भी मिलेगी पारिवारिक पेंशन, कोर्ट ने जवान के माता-पिता की याचिका की खारिज
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्र सरकार के दिवंगत कर्मचारियों की उन विधवाओं के पक्ष में निर्णय सुनाया है जिनकी कोई संतान नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसी विधवाएं दोबारा शादी करने के बाद भी पारिवारिक पेंशन (Family Pension) पाने की हकदार बनी रहेंगी।
न्यायमूर्ति अनिल क्षत्रपाल और न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने केंद्रीय सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम-1972 के नियम 54 और सितंबर 2009 के कार्यालय आदेश के नियम 8.6 को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
अदालत ने अपने फैसले में इस नियम के पीछे के सामाजिक और मानवीय उद्देश्यों पर प्रकाश डाला:
- सराहनीय उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि इन नियमों का मकसद विधवाओं को दोबारा शादी के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि वे एक नया जीवन शुरू कर सकें।
- आर्थिक सुरक्षा: यह सुनिश्चित करना सरकार की नीति है कि सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों (CAPFs) के सदस्यों द्वारा देश के लिए दिए गए बलिदान के बाद उनके सीधे आश्रित आर्थिक रूप से असुरक्षित न हों।
- नीति स्पष्ट है: पीठ के अनुसार, यदि विधवा के पास आय का पर्याप्त साधन नहीं है, तो दोबारा शादी के बाद भी उसे वित्तीय सहायता देना एक ‘वैध’ और ‘सराहनीय’ कदम है।
सीआरपीएफ (CRPF) जवान के माता-पिता की याचिका खारिज
यह मामला एक दिवंगत CRPF जवान के माता-पिता द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। जवान की मृत्यु के बाद उनकी विधवा को नियमानुसार पेंशन मिल रही थी। विधवा की दोबारा शादी होने पर माता-पिता ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि:
- शादी के बाद विधवा को पेंशन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।
- आश्रित माता-पिता होने के नाते पेंशन का हक उन्हें मिलना चाहिए।
- उन्होंने पेंशन नियमों को ‘मनमाना और भेदभावपूर्ण’ बताते हुए चुनौती दी थी।
अदालत ने माता-पिता की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पारिवारिक पेंशन एक कानूनी हक है। नियम 54 के तहत प्राथमिकता तय है:
- पेंशन पर पहला हक विधवा और बच्चों का होता है।
- माता-पिता पारिवारिक पेंशन के लिए तभी पात्र होते हैं जब मृत कर्मचारी अपने पीछे न तो विधवा छोड़ गया हो और न ही कोई बच्चा।
अदालत ने अंत में कहा कि पेंशन का मुख्य उद्देश्य कर्मचारी के सबसे करीबी आश्रितों को तुरंत और सुनिश्चित आर्थिक सहारा देना है, और वर्तमान नियमों में कोई त्रुटि नहीं है।

