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दिल्ली हाईकोर्ट का फुल बेंच फैसला: मेडिकल री-एग्ज़ाम के कारण देर से नियुक्त BSF जवानों को नहीं मिलेगी बैचमेट्स से वरिष्ठता

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट की फुल बेंच ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि जिन अभ्यर्थियों की नियुक्ति मेडिकल री-एग्ज़ामिनेशन (RME) के कारण देर से हुई, वे उन बैचमेट्स पर वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकते जिन्होंने उनसे पहले सेवा जॉइन कर ली थी, भले ही नियुक्ति में देरी अभ्यर्थियों की गलती न हो।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर, न्यायमूर्ति ज्योति सिंह और न्यायमूर्ति अजय डिगपॉल की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि बीएसएफ जनरल ड्यूटी कैडर (नॉन-गजेटेड) भर्ती नियम, 2002 के नियम 8 के तहत वरिष्ठता का निर्धारण “निरंतर नियमित नियुक्ति” के आधार पर होगा। इसका अर्थ यह है कि वरिष्ठता चयन या मेडिकल क्लीयरेंस की तारीख से नहीं, बल्कि उस तिथि से तय होगी जब अधिकारी की औपचारिक नियुक्ति हुई और उसने सेवा जॉइन की।

फुल बेंच ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि नियम 8(3) के तहत प्रत्यक्ष भर्ती में वरिष्ठता चयन में प्राप्त मेरिट के आधार पर तय होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम 8(3), नियम 8(2) के अधीन है और यह केवल उन्हीं मामलों में लागू होता है जहां अभ्यर्थियों की नियुक्ति एक ही समय पर हुई हो। यदि नियुक्तियां अलग-अलग तारीखों पर हुई हैं, तो वरिष्ठता नियुक्ति की तारीख के अनुसार ही तय होगी।

अदालत ने कहा, “जहां नियम 8(2) लागू होता है, वहां नियम 8(3) लागू नहीं हो सकता। प्रत्यक्ष भर्ती हो या पदोन्नति, किसी भी स्थिति में वरिष्ठता नियुक्ति की तारीख के आधार पर ही निर्धारित की जाएगी।”

इस फैसले के साथ ही अदालत ने वर्ष 2002–03 में स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (SSC) के माध्यम से भर्ती हुए बीएसएफ सब-इंस्पेक्टर्स की ओर से दायर याचिकाओं के एक समूह को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उन्हें अपने बैचमेट्स के बराबर वरिष्ठता दी जाए, क्योंकि उनकी नियुक्ति में देरी रिव्यू मेडिकल एग्ज़ामिनेशन के कारण हुई थी।

इस मामले को पहले एक डिवीजन बेंच ने सुना था, लेकिन समान मुद्दे पर अलग-अलग पीठों के भिन्न मतों को देखते हुए इसे फुल बेंच के पास भेजा गया था। फुल बेंच ने डिवीजन बेंच के शूरवीर सिंह नेगी मामले में दिए गए फैसले से सहमति जताई और राम पाल देसवाल मामले में व्यक्त विपरीत राय से असहमति प्रकट की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अंकुर छिब्बर ने पैरवी की, जबकि केंद्र सरकार की ओर से सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसिल फारमान अली सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।

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