CAPF जवानों की पुरानी पेंशन (OPS) का मामला : दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में अटकी लड़ाई
भारत की अर्धसैनिक बलों यानी पैरामिलिट्री फोर्सेज — BSF, CRPF, ITBP, CISF, SSB और Assam Rifles — को वर्ष 2011 से आधिकारिक रूप से Central Armed Police Forces (CAPF) कहा जाता है। इन बलों के जवानों के लिए पुरानी पेंशन व्यवस्था (OPS) का मुद्दा बीते कुछ वर्षों से लगातार बहस, आंदोलन और न्यायिक लड़ाई का विषय बना हुआ है।
दरअसल, जब इन बलों का गठन (Raise) किया गया था, तब जारी गजट नोटिफिकेशन में CAPF को स्पष्ट रूप से “भारतीय संघ के सशस्त्र बल (Armed Forces of the Union)” के रूप में परिभाषित किया गया था। यही नहीं, वर्ष 2004 में जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) लागू करने का गजट नोटिफिकेशन जारी किया, तब उसमें भी यह साफ लिखा गया था कि भारतीय संघ के सशस्त्र बलों के कार्मिकों को NPS से बाहर रखा जाएगा, और उन पर पुरानी पेंशन व्यवस्था (OPS) ही लागू रहेगी। NPS केवल 1 जनवरी 2004 के बाद भर्ती होने वाले अन्य सभी असैन्य विभागों के कर्मचारियों पर लागू की गई थी।
इसके बावजूद CAPF के जवानों को 1 जनवरी 2004 के बाद भर्ती होने पर NPS के दायरे में ला दिया गया, जिसे जवान लगातार अन्याय बताते रहे। समय-समय पर कई राज्य सरकारों ने अलग-अलग संदर्भों में भारत सरकार से CAPF की प्रकृति को लेकर सवाल पूछे। इन सवालों के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने लिखित रूप में कई बार यह स्वीकार किया कि CAPF, भारतीय संघ के सशस्त्र बल हैं और इन्हें उसी अनुरूप ट्रीट किया जाना चाहिए।
इन्हीं दस्तावेजों, गजट नोटिफिकेशन और तथ्यों को आधार बनाकर वर्ष 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने CAPF को भारतीय संघ का सशस्त्र बल मानते हुए कहा कि इन जवानों पर NPS नहीं बल्कि पुरानी पेंशन व्यवस्था (OPS) ही लागू होनी चाहिए। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि CAPF जवानों की ड्यूटी की प्रकृति, जोखिम, तैनाती की परिस्थितियाँ और कानूनी दस्तावेज — सभी यह साबित करते हैं कि इन्हें Armed Forces की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद भी CAPF जवानों को OPS का लाभ नहीं मिल सका। वर्तमान सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती (Challenge) दे दी, जिसके चलते मामला शीर्ष अदालत में लंबित हो गया। इसके बाद से जवानों को केवल “तारीख पर तारीख” ही मिल रही है, जबकि उनके भविष्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा यह अहम मुद्दा अब भी अनिश्चितता में फंसा हुआ है।
आज CAPF के लाखों जवान यह सवाल कर रहे हैं कि जब सरकार खुद उन्हें सशस्त्र बल मानती रही है, जब गजट नोटिफिकेशन और अदालत का फैसला उनके पक्ष में है, तो फिर उन्हें पुरानी पेंशन से वंचित क्यों रखा जा रहा है। यह मामला अब केवल पेंशन का नहीं, बल्कि न्याय, समानता और जवानों के सम्मान से जुड़ा हुआ बन चुका है।

