27 साल बाद CISF जवान की सेवा में बहाली, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का अहम फैसला
लगभग 27 वर्षों बाद केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक जवान को बड़ी न्यायिक राहत मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने CISF कॉन्स्टेबल रविंद्र कुमार राणा की सेवा में पुनर्बहाली के आदेश देते हुए कहा कि अर्धसैनिक बलों में अनुशासन के नाम पर की गई कार्रवाई भी न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकती।
यह अहम फैसला जस्टिस संदीप मौदगिल ने सुनाया। अदालत ने CISF द्वारा की गई बर्खास्तगी को “असंगत, साक्ष्यविहीन और विवेकहीन” करार दिया और कहा कि यदि सजा अपराध के अनुपात में न हो या जांच में साक्ष्यों की अनदेखी की गई हो, तो ऐसी सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
क्या है पूरा मामला
रविंद्र कुमार राणा की CISF में भर्ती वर्ष 1992 में हुई थी। वर्ष 1998 में असम स्थित ONGC नजीरा यूनिट में तैनाती के दौरान उन पर वरिष्ठ अधिकारी के साथ मारपीट, दुर्व्यवहार और आदतन अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए।
जून 1998 में उन्हें निलंबित किया गया और विभागीय जांच के बाद 5 अक्टूबर 1998 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उनकी विभागीय अपील मई 1999 में खारिज हो गई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
जांच प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जांच में पेश किए गए 10 गवाहों में से अधिकांश ने अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं किया। कुछ गवाहों ने यह भी स्वीकार किया कि उनकी जानकारी प्रत्यक्ष नहीं बल्कि सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी।
इसके बावजूद जांच अधिकारी द्वारा सभी आरोपों को सिद्ध मान लेना, अदालत के अनुसार, “माइंड एप्लीकेशन की पूरी तरह कमी” को दर्शाता है।
मेडिकल साक्ष्य का अभाव
अदालत ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि कथित शारीरिक हमले के समर्थन में कोई चिकित्सीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। जबकि याचिकाकर्ता की ओर से इसकी बार-बार मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि बैरक के भीतर ऐसी कोई घटना हुई होती, तो वहां मौजूद अन्य कर्मियों द्वारा उसका प्रत्यक्ष समर्थन जरूर मिलता, जो इस मामले में पूरी तरह नदारद रहा।
“अनुशासन जरूरी, लेकिन न्याय भी”
केंद्र सरकार की ओर से रविंद्र राणा के पुराने अनुशासनात्मक रिकॉर्ड का हवाला देकर उन्हें आदतन अनुशासनहीन बताने की दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि CISF जैसे अर्धसैनिक बलों में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन अनुशासनात्मक कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और तर्कसंगत निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि अनुशासन के नाम पर दी गई सजा इतनी कठोर हो कि वह “न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दे”, तो न्यायालय का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।
सेवा में बहाली और बकाया भुगतान का आदेश
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने रविंद्र कुमार राणा को सेवा से हटाने और उनकी अपील खारिज करने के आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत ने CISF को निर्देश दिया कि राणा को सेवा में बहाल किया जाए और उन्हें सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। इसमें वेतन और भत्तों का बकाया भुगतान शामिल होगा, जिस पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करना होगा।
यह फैसला न केवल CISF बल्कि सभी अर्धसैनिक बलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि अनुशासन के साथ-साथ न्याय और निष्पक्ष प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है।

